नयी दिल्ली , अक्टूबर 8 -- उच्चतम न्यायालय ने दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (एसएमए) से पीड़ित मरीजों के अत्यधिक महंगे इलाज के लिए गुरुवार को एक स्थायी वित्तीय सहायता तंत्र स्थापित करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने कहा कि इतनी महंगी चिकित्सा सहायता को महज कभी-कभार मिलने वाले दान या तदर्थ सरकारी मदद के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता एवं एमिकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) अपराजिता सिंह को एक समर्पित कोष के निर्माण के लिए व्यापक प्रस्ताव तैयार करने का निर्देश दिया। न्यायालय का उद्देश्य एक ऐसा कोष बनाना है जिसमें नियमित योगदान आ सके और ज़रूरतमंद मरीजों को निरंतर आर्थिक मदद मिलती रहे।

पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि मरीजों के परिवारों पर पड़ने वाले बार-बार के भारी वित्तीय बोझ से निपटने के लिए एकमुश्त व्यवस्था के बजाय एक सतत और भरोसेमंद प्रणाली की आवश्यकता है। प्रस्तावित ढांचे के तहत निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) पहलों, संस्थागत दानदाताओं और केंद्र सरकार से संभावित योगदान के विकल्पों की जांच की जाएगी।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यह कोष पूरी तरह से गैर-लाभकारी आधार पर होना चाहिए, ताकि उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम लाभ सीधे मरीजों तक पहुंचे। एमिकस क्यूरी को इस समर्पित कोष का प्रस्तावित ढांचा न्यायालय के सामने रखने के लिए चार सप्ताह का समय दिया गया है।

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