बीजापुर , अप्रैल 08 -- छत्तीसगढ के बीजापुर जिले में सदियों पुरानी रियासतकालीन परंपरा का निर्वहन करते हुए आराध्य देव बाबा चिकटराज देव वार्षिक अनुष्ठान के दौरान बुधवार को शासकीय तहसील कार्यालय पहुंचे, जहां राजस्व एवं प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में पारंपरिक "खजांची व्यवस्था" की रस्म निभाई गई। यह अनूठी परंपरा आज भी बस्तर अंचल की जीवंत सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है।
प्राप्त जानकारों के अनुसार रियासतकाल में कर संग्रह और राजकोष के निरीक्षण के लिए खजांची व्यवस्था लागू थी, जिसकी देखरेख राजा-महाराजा करते थे। वर्तमान में रियासतों का स्थान शासकीय तंत्र ने ले लिया है लेकिन उसी परंपरा को जीवित रखते हुए बाबा चिकटराज देव द्वितीय दिवस पर तहसील कार्यालय पहुंचते हैं। इस दौरान एक बक्सा खजांची के प्रतीक के रूप में रखा जाता है और विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना कर परंपरा का निर्वहन किया जाता है। इस अवसर पर पुजारी, मंदिर समिति के सदस्य और बड़ी संख्या में नगरवासी भी उपस्थित रहते हैं।
इसी परंपरा के साथ भट्टीपारा स्थित बाबा चिकटराज देव मंदिर में चैत्र माह के अवसर पर तीन दिवसीय वार्षिक मड़ई मेला एवं धार्मिक उत्सव भी संपन्न हुआ। सोमवार से प्रारंभ हुआ पूजा-अर्चना का क्रम मंगलवार होते हुए बुधवार की दोपहर तक जारी रहा, जबकि मेला आज शाम तक चलेगा। दोपहर को देवी-देवताओं की विदाई का कार्यक्रम पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न किया गया।
मड़ई मेले में अंचल के विभिन्न देवी-देवताओं का आगमन हुआ, जिनमें पोतराज, गुज्जा देव, मारा देव, कन्याराज, तुलडोकरी, नागभांठा, नीलपराज, हिरमा राज देव, ओरो पोंडी, भीमराव, चिन्नामरा, पैदामारा, हुंगुंडा, काटकरी, हडमा राज, पितागरराज और बमड़ा भीमराव सहित अन्य देव शामिल रहे। सभी देवी-देवताओं का पारंपरिक विधि से पूजन किया गया और सामुदायिक मेल-मिलाप के बीच मड़ई का आयोजन हुआ।
नक्सल प्रभाव में कमी आने के बाद इस वर्ष मड़ई मेले में पहले की तुलना में अधिक उत्साह देखा गया। छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों के अलावा महाराष्ट्र, तेलंगाना और ओडिशा से भी श्रद्धालु पहुंचे। धमतरी, कांकेर, जगदलपुर, गीदम और दंतेवाड़ा सहित कई क्षेत्रों से व्यापारी वर्ग ने भी अपनी भागीदारी दर्ज कराई, जिससे मेला क्षेत्रीय आस्था और सामाजिक समागम का बड़ा केंद्र बना रहा।
माटी पुजारी सुखलाल पुजारी ने बताया कि बाबा चिकटराज देव की पूजा हर वर्ष चैत्र माह में पारंपरिक विधि-विधान से की जाती है और यह मड़ई मेला क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उल्लेखनीय है कि महिलाओं के लिए बाबा चिकटराज देव के दर्शन वर्ष में केवल इसी तीन दिवसीय अवधि में संभव होते हैं।
मंदिर समिति के अनुसार, बस्तर की आराध्य मां दंतेश्वरी के दंतेवाड़ा में विराजमान होने के समय ही चिकटराज देव बीजापुर में स्थापित हुए थे। इनके पारंपरिक संबंधों में कांकेर में धर्मराज, गोंगला में कनपराज और चेरपाल में पोतराज सहित अन्य देवताओं का भी विशेष स्थान है।
मड़ई मेले के सफल आयोजन के बाद समिति ने जिला प्रशासन, पुलिस, वन, यातायात, नगर पालिका और स्वास्थ्य विभाग सहित सभी सहयोगी संस्थाओं तथा स्थानीय ग्रामीणों के प्रति आभार व्यक्त किया। समिति पदाधिकारियों ने कहा कि सामूहिक सहयोग से यह आयोजन शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित रूप से संपन्न हुआ।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित