छत्रपति संभाजीनगर , फरवरी 01 -- मूवमेंट फॉर पीस एंड जस्टिस (एमपीजे) के तत्वाधान में रविवार को यहां "सम्मान के साथ जीवन का अधिकार" विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया।

इस अवसर पर उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने देश में बढ़ती असमानता, बेरोज़गारी और संवैधानिक मूल्यों के क्षरण को लेकर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि ये कारक नागरिकों के मूल अधिकारों को कमजोर कर रहे हैं।

श्री भूषण ने कहा कि भारत की विविधता उसकी सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन नफ़रत फैलाने वाली शक्तियां सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचा रही हैं। उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के दायरे का विस्तार करते हुए भोजन, वस्त्र, आवास और बुनियादी सुविधाओं को जीवन के अधिकार में शामिल किया है, फिर भी आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी इनसे वंचित है। उन्होंने बाल कुपोषण और संवैधानिक संस्थाओं पर बढ़ते दबाव पर भी चिंता व्यक्त की।

सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष सआदतुल्लाह हुसैनी ने कहा कि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने के बावजूद भारत में गरीबों की संख्या अत्यधिक है। उन्होंने कहा कि समस्या संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि दोषपूर्ण नीतियों और भ्रष्टाचार की है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सामाजिक क्षेत्र में भारत का व्यय कई छोटे देशों की तुलना में कम है।

युवा हल्लाबोल के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुपम ने कहा कि भारत को युवा देश बताया जाता है, लेकिन बेरोज़गारी युवाओं को गहरे संकट में धकेल रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि रोज़गार, खाद्य सुरक्षा और शिक्षा जैसे मूल मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए भटकाने वाले विमर्श गढ़े जा रहे हैं, जबकि सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं और इसका पर्याप्त विरोध नहीं हो रहा। उन्होंने चेतावनी दी कि सामाजिक बदलाव की क्षमता रखने वाले युवाओं को नशे और धार्मिक-जातीय वैमनस्य की ओर मोड़ा जा रहा है।

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद, औरंगाबाद के अध्यक्ष सलमान मुक़र्रम ने कहा कि सरकारी अस्पतालों में तेज़ी से हो रहा निजीकरण मानव गरिमा को कमजोर कर रहा है। उन्होंने दावा किया कि एक सरकारी स्वास्थ्य योजना के बजट का 68 प्रतिशत हिस्सा धनाभाव के कारण लैप्स हो गया, जिससे अमीर-गरीब के लिए दोहरी स्वास्थ्य व्यवस्था बन रही है।

सामाजिक कार्यकर्ता व अधिवक्ता अभय तकसाल ने कहा कि समानता और संवैधानिक सिद्धांतों से हटकर शासन चलने पर सम्मानजनक जीवन का अधिकार साकार नहीं हो सकता। उन्होंने किसानों और युवाओं की बदहाली, प्रतिकूल सार्वजनिक नीतियों और सरकारी दफ्तरों में आम नागरिकों के अपमान की ओर ध्यान दिलाया।

एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स के राष्ट्रीय सचिव वासिक नदीम खान ने पहचान-आधारित नफ़रत और हिंसा पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि दर्ज की गई नफ़रतजनित घटनाओं में बड़ी संख्या धार्मिक पहचान से जुड़ी है, जिनमें मुसलमान और ईसाई सबसे अधिक प्रभावित हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि नागरिकों की रक्षा करने वाली संस्थाएँ कई बार विफल रहती हैं और 72 से अधिक ऐसे कानून पारित किए गए हैं जो संवैधानिक मूल्यों को कमजोर करते हैं।

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