चंडीगढ़ , अक्टूबर 18 -- पंजाब के पूर्व विशेष सचिव एवं सेवानिवृत्त भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी केबीएस सिद्धू ने प्रस्तावित राष्ट्रीय इस्पात नीति 'विजन 2047' के मसौदे में राज्य और उसके प्रमुख इस्पात औद्योगिक केंद्रों मंडी गोबिंदगढ़ तथा लुधियाना का उल्लेख नहीं होने पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने केंद्रीय इस्पात मंत्रालय को भेजे सुझावों में राज्य के सेकेंडरी स्टील उद्योग के लिए विशेष संक्रमण योजना, आधुनिक सुविधाओं और बेहतर माल ढुलाई व्यवस्था विकसित करने की मांग की है।
श्री सिद्धू ने शुक्रवार को लिखे पत्र में कहा कि इस्पात मंत्रालय ने 11 अक्टूबर को नीति का मसौदा सार्वजनिक किया था और इस पर 30 अक्टूबर तक सुझाव आमंत्रित किए हैं। उन्होंने मसौदे को इस्पात क्षेत्र के लिए व्यापक दस्तावेज बताते हुए कहा कि इसमें 2047 तक भारत की कच्चे इस्पात की उत्पादन क्षमता बढ़ाकर 60.4 करोड़ टन प्रतिवर्ष करने और प्रति व्यक्ति इस्पात खपत 116 किलोग्राम से बढ़ाकर 302 किलोग्राम करने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने नीति में कच्चे माल की उपलब्धता, उत्पादवार आयात-निर्यात और दीर्घकालिक निवेश संबंधी कुछ पहलुओं को अधिक स्पष्ट करने की जरूरत बताई। उनके अनुसार, कोकिंग कोयले के लिए भारत की आयात निर्भरता लगभग 92 प्रतिशत है लेकिन मसौदे में 2047 तक आयात के अनुपात और घरेलू उत्पादन के स्पष्ट लक्ष्य नहीं दिए गए हैं। उन्होंने तैयार इस्पात के घरेलू उपयोग और निर्यात लक्ष्यों के बीच संबंध भी स्पष्ट करने का सुझाव दिया।
श्री सिद्धू ने कहा कि मंडी गोबिंदगढ़-खन्ना-लुधियाना का औद्योगिक क्षेत्र इंडक्शन फर्नेस और री-रोलिंग मिलों पर आधारित है। नीति के मसौदे में इंडक्शन फर्नेस की हिस्सेदारी मौजूदा लगभग 38 प्रतिशत से घटकर 2047 तक 15 प्रतिशत रहने की धारणा अपनाई गई है लेकिन इस बदलाव के लिए कोई स्पष्ट संक्रमण योजना, आधुनिकीकरण की समय-सीमा या औद्योगिक क्लस्टर कार्यक्रम नहीं बताया गया। उन्होंने लुधियाना के हाई-टेक वैली में टाटा स्टील के 7.50 लाख टन प्रतिवर्ष क्षमता वाले स्क्रैप आधारित इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस का उल्लेख किया। उनके अनुसार, 20 मार्च 2026 को शुरू हुए इस संयंत्र का निर्धारित कार्बन उत्सर्जन प्रति टन इस्पात 0.3 टन से कम है, जबकि मसौदे में 2047 के लिए राष्ट्रीय लक्ष्य 1.54 प्रति टन इस्पात रखा गया है। उन्होंने कहा कि पंजाब में पहले से मौजूद ऐसी तकनीक और पुराने औद्योगिक क्लस्टरों के बीच तालमेल को नीति में जगह मिलनी चाहिए।
उन्होंने मंडी गोबिंदगढ़ स्थित राष्ट्रीय सेकेंडरी स्टील प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईएसएसटी) को उत्तरी भारत के लिए उत्कृष्टता केंद्र के रूप में विकसित करने का सुझाव दिया। इसके साथ ही उन्होंने मंडी गोबिंदगढ़ में साझा सुविधाओं वाला एक पायलट औद्योगिक क्लस्टर स्थापित करने, छोटे उद्योगों के अनुकूल आकार में स्क्रैप उपलब्ध कराने और खदानों से दूर स्थित इकाइयों के लिए पेलेट तथा स्पंज आयरन की सुनिश्चित आपूर्ति की व्यवस्था करने की मांग की। उनके अन्य सुझावों में लुधियाना में पूर्वी समर्पित माल ढुलाई गलियारे पर इस्पात टर्मिनल स्थापित करना, क्लस्टर स्तर पर हरित इस्पात प्रमाणन की व्यवस्था करना और यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (सीबीएएम) से निपटने में लुधियाना के इस्पात-आधारित निर्यातकों की मदद करना शामिल है। उन्होंने पंजाब में केंद्र सरकार के सार्वजनिक क्षेत्र के इस्पात उपक्रमों की मौजूदगी बढ़ाने का भी सुझाव दिया।
श्री सिद्धू ने कहा कि पंजाब सीमावर्ती और स्थल-रुद्ध राज्य है, जहां लौह अयस्क और कोयले के अपने संसाधन नहीं हैं तथा सार्वजनिक क्षेत्र का कोई इस्पात संयंत्र भी नहीं है। इसके बावजूद निजी उद्यम और कुशल श्रमिकों के दम पर यहां इस्पात उद्योग विकसित हुआ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके सुझावों का उद्देश्य किसी कर रियायत की मांग करना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नीति में पंजाब के उद्योग को उचित स्थान दिलाना है। उन्होंने इस्पात मंत्रालय से मसौदे को अंतिम रूप देने से पहले चंडीगढ़ या मंडी गोबिंदगढ़ में उद्योग से जुड़े पक्षों के साथ परामर्श बैठक आयोजित करने का आग्रह भी किया, ताकि उत्तर भारत की लघु, सूक्ष्म और मध्यम इस्पात इकाइयों की समस्याओं तथा सुझावों को नीति में शामिल किया जा सके।
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