रायपुर , अक्टूबर 20 -- छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित राज्य फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) में डिजिटल साक्ष्यों की जांच के लिए आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। सेंट्रल इंडिया की पहली सिंथेटिक मीडिया डिटेक्शन सुविधा के जरिए धुंधले सीसीटीवी फुटेज, लॉक आईफोन-टैबलेट और डीपफेक फोटो-वीडियो की जांच की जा रही है। प्रयोगशाला में अब तक 1200 से ज्यादा फोन और लैपटॉप की जांच की जा चुकी है, जबकि 130 से ज्यादा डिवाइस की जांच कर रिपोर्ट दी गई है।

मल्टीमीडिया फोरेंसिक तकनीक के माध्यम से विशेषज्ञ डिजिटल सामग्री की सत्यता परखने के लिए पिक्सल, रोशनी-परछाई, लिप-सिंक, ऑडियो स्पेक्ट्रोग्राम और मेटाडेटा का विश्लेषण कर रहे हैं। इस सुविधा का लाभ केंद्रीय जांच एजेंसियां भी उठा रही हैं। आईटी, सीबीआई, ईडी, एनआईए, डीआरआई और एनसीबी जैसी एजेंसियां जब्त इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस की जांच के लिए राज्य फोरेंसिक लैब की मदद ले रही हैं। इससे जांच के लिए डिवाइस को दूसरे स्थानों पर भेजने की जरूरत कम हुई है।

अधिकारियों से आज मिली जानकारी के मुताबिक, लैब की जांच क्षमता बढ़ाने के लिए नए सॉफ्टवेयर खरीदने की तैयारी की जा रही है। केंद्र सरकार इसकी क्षमता और सुविधाओं के विस्तार के लिए 80 करोड़ रुपए देने वाली है। डीपफेक की पहचान के लिए महंगे सॉफ्टवेयर खरीदे जाएंगे। इसके साथ ही एआई आधारित डिटेक्शन टूल की मदद से संदिग्ध डिजिटल कंटेंट की जांच की जाएगी।

डिजिटल साक्ष्यों की जांच में सबसे बड़ी चुनौती इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में मौजूद डेटा को सुरक्षित रखना और उसे रिकवर करना है। मोबाइल फोन, टैबलेट, लैपटॉप और पेनड्राइव समेत विभिन्न उपकरणों की जांच की जा रही है। अधिकारियों के अनुसार, करीब 90 फीसदी मामलों में पुलिस के पास डिवाइस का पासवर्ड या पैटर्न लॉक उपलब्ध नहीं होता। खासकर आईफोन को अनलॉक करना चुनौतीपूर्ण होता है।

इसके बावजूद प्रयोगशाला में टूटे हुए और पानी में डूबे फोन सहित विभिन्न प्रकार के उपकरणों से डिजिटल डेटा निकालने का काम किया जा रहा है। व्हाट्सएप और टेलीग्राम की चैट के साथ फेसबुक और इंस्टाग्राम से संबंधित डेटा भी रिकवर किया जा रहा है।

डीपफेक फोटो और वीडियो की वास्तविकता जांचने के लिए विशेषज्ञ कई तकनीकी प्रक्रियाओं का सहारा लेते हैं। पिक्सल टेस्ट के जरिए चेहरे के किनारों पर धुंधलेपन और एडिटिंग के निशानों की पहचान की जाती है। लाइट-शैडो टेस्ट में चेहरे पर पड़ने वाली रोशनी और परछाई का आसपास के दृश्य से मिलान किया जाता है।

लिप-सिंक परीक्षण में आवाज और होंठों की गतिविधियों का फ्रेम-दर-फ्रेम विश्लेषण किया जाता है। वहीं, ऑडियो स्पेक्ट्रोग्राम के माध्यम से सांस, आवाज में ठहराव और बैकग्राउंड नॉइस की जांच होती है। मेटाडेटा के विश्लेषण से फाइल की तारीख, इस्तेमाल किए गए डिवाइस और एडिटिंग सॉफ्टवेयर से जुड़ी जानकारी जुटाई जाती है। इन परीक्षणों के आधार पर डिजिटल सामग्री के स्रोत और उसमें संभावित छेड़छाड़ का पता लगाने में मदद मिलती है।

राज्य फोरेंसिक लैब की रिपोर्ट को 18 देशों में दोबारा जांच के लिए भेजा गया। सभी जगह की रिपोर्ट रायपुर की लैब की रिपोर्ट की तरह रही। इसलिए विदेशों में भी यहां की लैब की रिपोर्ट मान्य है।

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