शिमला , मार्च 03 -- हिमाचल प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार की घोषणा में देरी को कांग्रेस के रणनीतिक फैसले के रूप में देखा जा रहा है, जो उसकी पिछली विफलताओं के सबक से आकार ले रहा है।
पिछली बार विधानसभा में बहुमत के बावजूद पार्टी को अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा था। इससे राजनीतिक शर्मिंदगी झेलनी पड़ी और आंतरिक मतभेद सार्वजनिक हो गये थे।
इस परिणाम ने छोटे राज्यों में राज्यसभा चुनावों के एक महत्वपूर्ण पहलू का उल्लेख किया कि केवल विधायी अंकगणित ही जीत सुनिश्चित नहीं करती है। चूंकि अप्रत्यक्ष मतदान प्रक्रिया जरिये परिणाम तय होता है, इसलिए सीमित क्रॉस-वोटिंग या अनुपस्थिति भी परिणाम बदल सकती है।
पिछली घटना ने गुटीय असंतुलन और अपर्याप्त आंतरिक समन्वय के जोखिमों को उजागर किया था। इसी पृष्ठभूमि में उम्मीदवार को अंतिम रूप देने में वर्तमान देरी को व्यापक रूप से आम सहमति बनाने और पिछली गलती दोहराने से बचने का प्रयास माना जा रहा है।
पार्टी आलाकमान जिसे भी उम्मीदवार घोषित करेगा नामांकन के अंतिम दिन पांच मार्च को वही नामांकन दाखिल करेगा। चुनाव 16 मार्च को है। माना जा रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व अपने उम्मीदवार की घोषणा करने से पहले आंतरिक समीकरणों का सावधानीपूर्वक आकलन कर रहा है।
प्रमुख चुनौती राज्य इकाई के भीतर कई शक्ति केंद्रों के बीच संतुलन बनाने का है। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का प्रभाव पार्टी की गतिशीलता को आकार देना जारी रखता है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष प्रतिभा सिंह और राज्य के लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह को उस विरासत का प्रतिनिधित्व करने वाला माना जाता है। पार्टी के कुछ वर्गों में उनका समर्थन बरकरार है।
साथ ही मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाला खेमा प्रशासनिक अधिकार रखता है और विधायी प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रमुख जिलों के क्षेत्रीय नेता भी प्रभाव रखते हैं, जबकि उम्मीदवार चयन में पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व अंतिम अधिकार रखता है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह मुकाबला केवल पार्टियों के बीच नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर के गुटों के बीच भी है। मुख्यमंत्री का खेमा परिचालन अनुशासन सुनिश्चित करता है, विरासत वाला खेमा ऐतिहासिक वैधता प्रदान करता है, क्षेत्रीय नेता क्षेत्रीय संतुलन की रक्षा करते हैं और केंद्रीय नेतृत्व रणनीतिक दिशा प्रदान करता है। संख्यात्मक ताकत को सुचारू और निर्विरोध जीत में बदलने के लिए इन केंद्रों के बीच समन्वय आवश्यक है।
अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के साथ राज्यसभा चुनाव को आंतरिक एकता की प्रारंभिक परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है।
एक सकारात्मक नतीजा स्थिरता को मजबूत करेगा, जबकि किसी भी प्रकार का मतभेद विपक्ष को राजनीतिक लाभ प्रदान कर सकता है।
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