बेंगलुरु , सितंबर 19 -- राज्यसभा के पूर्व सदस्य राजीव गौड़ा ने शनिवार को चेतावनी दी कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से शुरुआती स्तर की नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं।

उन्होंने भारत के युवा श्रमशक्ति को एआई और एआई के बाद के दौर के लिए तैयार करने के उद्देश्य से इंटर्नशिप पारिस्थितिकी तंत्र में व्यापक सुधार का आह्वान किया।

यहां चौथे बीसीआईसी लीडरशिप समिट को संबोधित करते हुए श्री गौड़ा ने कहा कि तकनीक के कारण रोज़गार के स्वरूप में बदलाव आ रहा है, ऐसे में व्यापार 'हाथ पर हाथ धरे बैठकर हालात का इंतज़ार' नहीं कर सकते। उन्होंने युवा क्षमता को तैयार करने में उद्योग की ज़्यादा भागीदारी की अपील की।

श्री गौड़ा ने केंद्र की 'प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना' की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए। उन्होंने योजना के पहले दौर के आंकड़े पेश किए, जिनमें 1.27 लाख इंटर्नशिप की पेशकश की गई थी, लेकिन केवल 22 प्रतिशत ही स्वीकार की गईं, सात प्रतिशत उम्मीदवार शामिल हुए और आखिरकार सिर्फ़ 3,995 उम्मीदवारों ने ही इंटर्नशिप पूरी की।

उन्होंने कहा कि इन आंकड़ों से पता चलता है कि कंपनियों को इंटर्नशिप को सिर्फ़ रिज़्यूम में जोड़ने वाली चीज़ न मानकर, सार्थक एवं व्यवस्थित इंटर्नशिप प्रोग्राम बनाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि इस इंटर्नशिप पारिस्थितिकी तंत्र में कुछ कमी है। उन्होंने सुझाव दिया कि कंपनियों को तय परियोजनाओं, मेंटरशिप और काम की जगह पर सार्थक अनुभव वाले एक या दो महीने के कार्यक्रम उपलब्ध करने चाहिए।

श्री गौड़ा ने कहा कि कार्यस्थल पर मिलने वाला अनुभव तब और भी अहम् हो जाएगा, जब एआई शुरुआती स्तर की नौकरियों का स्वरूप बदल देगा।

उन्होंने कहा कि बेंगलुरु को सॉफ्टवेयर उद्योग से बहुत फ़ायदा हुआ है, जिसने देश भर के लाखों युवाओं को रोज़गार दिया है, लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि नियुक्तियों में किसी भी तरह की सुस्ती का शहर की अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ सकता है।

श्री गौड़ा ने अनुसंधान एवं नवाचार में निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी का भी आह्वान किया और कहा कि भारत का कुल अनुसंधान एवं विकास व्यय सकल घरेलू उत्पाद के एक प्रतिशत से भी कम है।उन्होंने कहा, "अनुसंधान का उद्देश्य ज्ञान की सीमाओं को आगे बढ़ाना है।"उन्होंने कंपनियों से आग्रह किया कि वे अनुसंधान को केवल सरकार और सार्वजनिक संस्थानों पर छोड़ने के बजाय, इसे अपनी पेशेवर गतिविधियों का हिस्सा बनाएं।

उन्होंने कहा कि बेंगलुरु में अनुसंधान क्षमता का बड़ा भंडार है, लेकिन उस क्षमता को पेटेंट, उत्पाद और नवाचार में परिवर्तित करने के लिए शिक्षा जगत और उद्योग जगत के बीच मज़बूत संपर्क की ज़रूरत है।

श्री गौड़ा ने कहा कि बेंगलुरु में बहुराष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र भारतीय प्रतिभाओं का सफलतापूर्वक उपयोग कर रहे हैं, जबकि घरेलू संस्थानों को बेहतर प्रोत्साहन और संपर्क तंत्र बनाने की आवश्यकता है, ताकि शोधकर्ता नवाचार में अधिक प्रभावी ढंग से योगदान दे सकें।

श्री गौड़ा ने कारोबारी समुदाय से यह भी आग्रह किया कि बेंगलुरु के बदलाव से उत्पन्न हुए अवसरों को आगे बढ़ाते हुए कम विशेषाधिकार प्राप्त पृष्ठभूमि वाले युवाओं के लिए करियर मार्गदर्शन, मेंटरिंग और पेशेवर नेटवर्क तक पहुंच का विस्तार करें।

उन्होंने कहा कि वैश्विक रूप से जुड़े शहर में रहने के बावजूद, बेंगलुरु में कई छात्रों को अभी भी करियर के बारे में जागरूकता की कमी है।

उन्होंने बीसीआईसी में एक लघु-व्यवसाय मार्गदर्शन इकाई स्थापित करने का भी सुझाव दिया, जो उद्यमियों को व्यवसाय शुरू करने, विस्तार करने और प्रबंधन करने में सहायता प्रदान करे, जिसमें कई भाषाओं में ऑनलाइन सामग्री, पॉडकास्ट और वीडियो के माध्यम से सहायता भी शामिल हो।

श्री गौड़ा ने पिछले पांच दशकों में बेंगलुरु के बदलाव को याद किया, जो एचएमटी, आईटीआई, एचएएल और एनएएल जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के प्रभुत्व वाले शहर से परिवर्तित होकर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी प्रौद्योगिकी एवं उद्यमिता केंद्र बन गया है।

उन्होंने कहा कि शहर की सफलता व्यवसायों, संस्थानों, प्रतिभाओं और सार्वजनिक अवसंरचना से जुड़े एक व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र का परिणाम है और अब कारोबारी समुदाय को उन अवसरों को स्थापित कॉर्पोरेट पारिस्थितिकी तंत्र से आगे बढ़ाने में मदद करनी चाहिए।

श्री गौड़ा ने "बेंगलुरु से परे" एजेंडे पर अधिक ध्यान देने का आह्वान करते हुए कहा कि विकास का अगला चरण केवल शहर तक सीमित नहीं होना चाहिए बल्कि पूरे कर्नाटक में अवसर पैदा करने चाहिए।

उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में नेतृत्व के लिए व्यवसायों को तात्कालिक वाणिज्यिक उद्देश्यों से आगे देखने और नवाचार, स्थिरता, लचीलेपन तथा अपने निर्णयों के व्यापक प्रभाव पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता होगी।

श्री गौड़ा ने कहा कि नेताओं के लिए चुनौती अल्पकालिक व्यावसायिक प्राथमिकताओं को दीर्घकालिक उद्देश्य के साथ संतुलित करना और यह सुनिश्चित करना है कि संगठन तकनीकी, आर्थिक और सामाजिक बदलावों के अनुकूल ढलने में सक्षम हों।

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