नयी दिल्ली , सितम्बर 01 -- रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) से अपने टर्नओवर का एक हिस्सा अनुसंधान, विकास और प्रौद्योगिकी उन्नयन में निवेश करने तथा विश्वविद्यालयों, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों, शोध संस्थानों, रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन प्रयोगशालाओं, स्टार्टअप और बड़े उद्योगों के साथ साझेदारी करने का आह्वान किया, ताकि वे घरेलू आपूर्तिकर्ताओं से आगे बढ़कर वैश्विक उद्यम बन सकें और 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य में योगदान दे सकें।

श्री सिंह ने मंगलवार को ग्रेटर नोएडा में एक एमएसएमई कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि विकसित भारत का अर्थ वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी विनिर्माण, प्रौद्योगिकी और नवाचार में नेतृत्व तथा रणनीतिक और आर्थिक क्षमताओं में आत्मनिर्भर राष्ट्र से है, जो युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार के अवसर पैदा करने में सक्षम हो।

उन्होंने कहा कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में बदलाव और विश्वसनीय विनिर्माण साझेदारों की बढ़ती मांग भारत के लिए बड़ा अवसर है। उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, ओमान, स्विट्जरलैंड और यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौतों सहित प्रमुख देशों के साथ व्यापार साझेदारी मजबूत करने के प्रयासों का उल्लेख किया और एमएसएमई से इन समझौतों का पूरा लाभ उठाने तथा 'मेक इन इंडिया, मेक फॉर इंडिया और मेक फॉर द वर्ल्ड' के सिद्धांत के अनुरूप भारतीय उत्पादों को वैश्विक बाजार तक पहुंचाने को कहा।

श्री सिंह ने बताया कि एमएसएमई की संख्या 2012-13 में करीब 4.67 करोड़ से बढ़कर आज लगभग 8 करोड़ हो गयी है। उन्होंने इसे भारत के उद्यमशीलता तंत्र की बढ़ती गहराई और गतिशीलता का संकेत बताया। रक्षा विनिर्माण में एमएसएमई की क्षमता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आईडेक्स और एडीआईटीआई जैसी पहल स्टार्टअप, नवोन्मेषकों और एमएसएमई को रक्षा बलों के लिए अत्याधुनिक समाधान विकसित करने में सक्षम बना रही हैं। उन्होंने ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, साइबर सुरक्षा, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, स्वायत्त प्रणालियों, उन्नत सामग्री, अंतरिक्ष और क्वांटम प्रौद्योगिकियों को भारतीय एमएसएमई के लिए बड़े अवसर वाले क्षेत्र बताया।

उन्होंने कहा कि एमएसएमई की वृद्धि और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए प्रौद्योगिकी के साथ गुणवत्ता, कौशल विकास, प्रौद्योगिकी उन्नयन, बाजार तक पहुंच और वित्त पर समान ध्यान जरूरी है। उन्होंने रक्षा क्षेत्र में 'जीरो डिफेक्ट' और 'गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं' के सिद्धांत के प्रति प्रतिबद्धता पर जोर दिया तथा युवाओं को उद्योग-प्रासंगिक कौशल से लैस करने और एमएसएमई को अपने कार्यबल के निरंतर कौशल उन्नयन के लिए प्रोत्साहित किया।

रक्षा मंत्री ने एमएसएमई के लिए डिजिटल विनिर्माण, ऑटोमेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिक उत्पादन विधियों जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों को अधिक सुलभ और किफायती बनाने की आवश्यकता बतायी। उन्होंने सरकारी खरीद, बड़े उद्योगों के वेंडर इकोसिस्टम और निर्यात बाजारों में एमएसएमई की अधिक भागीदारी पर जोर दिया। उन्होंने समय पर और किफायती पूंजी उपलब्धता को एमएसएमई की वृद्धि की सबसे महत्वपूर्ण जरूरतों में से एक बताया और वित्तीय अनुशासन तथा मजबूत कारोबारी प्रथाओं के साथ इसे जोड़ने की बात कही।

उत्तर भारत के एमएसएमई क्षेत्र के महत्व को रेखांकित करते हुए श्री सिंह ने कहा कि यह विनिर्माण, इंजीनियरिंग, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, कपड़ा, खाद्य प्रसंस्करण और सेवाओं सहित विभिन्न क्षेत्रों में मजबूत उपस्थिति रखता है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में रक्षा औद्योगिक गलियारे ने रक्षा विनिर्माण के लिए नये अवसर पैदा किये हैं और राज्य भारत के नए विनिर्माण तथा रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभर रहा है।उन्होंने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली और हरियाणा के एमएसएमई से इन अवसरों का पूरा लाभ उठाने और बड़ी रक्षा कंपनियों के आपूर्तिकर्ताओं से आगे बढ़कर प्रौद्योगिकी विकासकर्ता, सिस्टम आपूर्तिकर्ता और निर्यातक बनने का आह्वान किया।

श्री सिंह ने युवाओं को नौकरी तलाशने वालों के बजाय रोजगार पैदा करने वाला बनने के लिए प्रेरित करने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने महिलाओं और युवाओं के लिए अधिक अवसर पैदा करने तथा छोटे शहरों और कस्बों को आर्थिक विकास के नए केंद्रों के रूप में विकसित करने की आवश्यकता बतायी। उन्होंने कहा कि 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य केवल सरकार का उद्देश्य नहीं, बल्कि सामूहिक आकांक्षा है, जिसके लिए सरकार, उद्योग, एमएसएमई, स्टार्टअप, अकादमिक जगत और नागरिक समाज के संयुक्त प्रयास जरूरी हैं।

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