रांची , अक्टूबर 11 -- झारखंड के रामगढ़ जिले के रजरप्पा में भैरवी और दामोदर नदी के संगम पर स्थित मां छिन्नमस्तिका मंदिर मंदिर असम के माँ कामाख्या मंदिर के बाद दुनिया के सबसे विख्यात शक्तिपीठ हैं।
सिद्धपीठ मां छिन्नमस्तिका मंदिर में कलश स्थापना के साथ नौ दिवसीय अनुष्ठान शुरू हो गया। भक्ति का विशेष माहौल देखने को मिल रहा है। कोई मां के दर्शन-पूजन के लिए पहुंच रहा है, तो कोई मंदिर परिसर में बने हवन कुंडों में बैठकर साधना और अनुष्ठान में लीन है।
नौ दिनों तक चलने वाले इस धार्मिक आयोजन को लेकर मंदिर न्यास समिति और जिला प्रशासन की ओर से तैयारियां की जा रही हैं. नवरात्र के दौरान मंदिर का आकर्षक स्वरूप श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनने वाला है.रजरप्पा का यह सिद्धपीठ केवल एक मन्दिर के लिए ही विख्यात नहीं है, बल्कि इस मंदिर के अलावा यहाँ महाकाली मंदिर, सूर्य मंदिर, दश महाविद्या मंदिर, बाबा धाम मंदिर, शंकर मंदिर और विराट रूप मंदिर के नाम से कुल सात मंदिर हैं। मंदिर की उत्तरी दीवार के साथ रखे एक शिलाखंड पर दक्षिण की ओर मुख किए माँ छिन्नमस्ता का दिव्य रूप अंकित है। माँ छिन्नमस्ता मंदिर के अंदर स्थित शिलाखंड में माँ की तीन आँखे हैं। बायाँ पाँव (पैर) आगे की ओर बढ़ते हुए वे कमल पुष्प पर खड़ी है। पाँव (गैर) के नीचे उल्टी मुद्रा में कामदेव और रती सोए हुए हैं।
माँ छिन्नमस्ता के गले में सांपों की और मुंडों की माला सुशोभित हैं। मंदिर का मुख्य द्वार पूर्वमुखी हैं। मंदिर के सामने बलि का स्थान है। इस स्थान पर प्रत्येक दिन कम से कम 100-200 बकरों की बलि दी जाती हैं। मंदिर के निर्माण काल के बारे में पुरातत्व विभाग के विशेषज्ञों में मतभेद है। कई विशेषज्ञ का कहना है कि इस मंदिर का निर्माण 6000 साल पहले हुआ था और कई इसे महाभारतकालीन का मंदिर बताते हैं। मान्यता की उस समय यह मंदिर स्वयं अस्तित्व में आया था। हालांकि हाल के वर्षों में इसमें कई निर्माण किए गये है।
माँ छित्रमस्ता की महिमा की कई पुरानी कथाएँ प्रचलित हैं। प्राचीनकाल में छोटानागपुर में रज नामक एक राजा राज करते थे। राजा की पत्नी का नाम रूपमा था। इन्हीं दोनों के नाम से इस स्थान का नाम रजरूपमा पड़ा, जो बाद में परिष्कृत होते हुए रजरप्पा हो गया।
शिलाखंड के अनुसार राजा को सपना आया जिसमें एक कन्या कह रही है कि राजन, मैं छिन्नमस्ता देवी हूँ। मैं तुम्हें वरदान देती हूँ कि आज से ठीक नौवें महीने तुम्हें पुत्र की प्राप्ति होगी। देवी बोली है राजन् मिलन स्थल के समीप तुम्हें मेरा एक मंदिर दिखाई देगा। इस मंदिर के अंदर शिलाखंड पर मेरी प्रतिमा अंकित दिखेगी। तुम सुबह पूजा कर बलि चढ़ाओ। ऐसा कहकर छिन्नमस्ता अंतर्ध्यान हो गई। इसके बाद से ही यह पवित्र तीर्थ रजरप्पा के रूप में विख्यात हो गया।
एक कथा के अनुसार एक बार पूर्णिमा की रात में शिकार की खोज में राजा दामोदर और भैरवी नदी के संगमस्थल पर पहुंचे। रात्रि विश्राम के दौरान राजा ने स्वप्न में लाल वस्त्र धारण किए तेज मुख मंडल वाली एक कन्या देखी। उसने राजा से कहा है राजन इस आयु में संतान न होने से तेरा जीवन सुना लग रहा है। मेरी आज्ञा मानोगे तो रानी की गोद भर जाएगी। राजा की आँख खुली तो वे इधर-उधर भटकने लगे। इस बीच उनकी आँखे स्वप्न में दिखी कन्या से जा टिकी। वह कन्या जल के भीतर से राजा के सामने प्रकट हुई। उसका रूप अलौकिक था यह देख राजा भयभीत हो उठे।
वहीं लोगों का मानना है कि यहाँ पर मांगी गई मनोकामना जरूर पूरी होती है। लोगों की मनोकामना जब पूरी हो जाती है तो बकरे की बलि भी लोग देते है।
पुजारी सुबोध पंडा के अनुसार माँ छिन्नमस्ता देवी की पूजा खासतौर से शत्रुओं पर जीत प्राप्त करने के लिए की जाती है। माँ का रूप उग्र है। इसलिए तंत्र मंत्र कि क्रियाओं में भी इनकी पूजा करने की परंपरा है। इन्हें बलि चढ़ाकर और तंत्र साधना के जरिए भक्त अपनी मनोकामना को पूरी करते हैं। शारदीय नवरात्र के मौके पर मंदिर प्रांगण फूलों की खुशबू से महकता रहेगा। यहाँ कई प्रदेशों के श्रद्धालु दर्शन करने आएंगे।
माँ छिन्नमस्ता मंदिर से निकट एयरपोर्ट रांची में लगभग 80 किमी की दूरी पर स्थित है। राँची किराए पर गाड़ी ले सकते हैं या रजरप्पा के लिए बस पकड़ कर आ सकते हैं। सुबह से शाम तक मंदिर पहुँचने के लिए बस, टैक्सियां एवं ट्रैकर उपलब्ध है। ट्रेन से रजरप्पा पहुंचने का सबसे अच्छा रास्ता है रामगढ़ रेलवे स्टेशन के लिए सीधी ट्रेन है जो मंदिर से लगभग 28 किमी की दूरी पर स्थित है। गोला रोड रेलवे स्टेशन से भी 15कि.मी. तय कर माता के दरबार में श्रद्धालु पहुँचते हैं।
स्टेशन से, आप रजरप्पा के लिए सीधी बस या सीधी टैक्सी किराए पर ले सकते हैं। वही छिन्नमस्ता मंदिर बस या अपने वाहन से भी आसानी से (सड़क मार्ग) पहुँचा जा सकता है। इधर, मंदिर में देवी मां के दर्शन करने के अलावा, आप रजरप्पा शहर की सुंदरता को भी देख सकते हैं। रजरप्पा वॉटरफॉल यहाँ देखने लायक है, जो एक अन्य प्रमुख आकर्षण है। नौकाविहार का भी श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केन्द्र होता है। आप मंदिर आसपास के क्षेत्र में भैरवी और दामोदर नदियों के संगम का भी आनंद ले सकते हैं।
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