विद्या शंकर रायलखनऊ , मार्च 10 -- उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण समाज एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ब्राह्मण वोट बैंक और यूजीसी मुद्दे को लेकर सवर्ण समाज की नाराजगी राज्य की राजनीति में एक अहम अंडरकरंट के रूप में उभर सकता है और इसका ख़ामियाज़ा सत्तारूढ़ पार्टी को भुगतना पड़ सकता है।

प्रदेश की कुल आबादी में लगभग 10 से 12 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाला ब्राह्मण समाज कई विधानसभा क्षेत्रों में निर्णायक प्रभाव रखता है। ऐसे में सभी प्रमुख राजनीतिक दल इस वर्ग को साधने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। हाल के कुछ घटनाक्रमों ने यह बहस तेज कर दी है कि समुदाय के कुछ वर्गों में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रति असंतोष की भावना है, हालांकि भाजपा नेताओं ने ऐसे दावों को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है।

पिछले दिनों भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी द्वारा लखनऊ में करीब 50 ब्राह्मण विधायकों के सहभोज को लेकर सार्वजनिक आपत्ति जताने के बाद इस मुद्दे ने और तूल पकड़ लिया था । इस टिप्पणी को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हुई और समुदाय के कुछ लोगों ने इसे लेकर नाराजगी भी जताई थी।

इसके अलावा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों को लेकर भी विवाद सामने आया, जिनके बारे में कुछ लोगों का कहना है कि ये ऊंची जातियों के छात्रों के खिलाफ हैं। प्रयागराज में ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और माघ मेला प्रशासन के बीच हुए विवाद ने भी इस बहस को हवा दी।

हाल ही में लखनऊ में आयोजित एक ब्राह्मण सम्मेलन में पूर्व उपमुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद दिनेश शर्मा को नारेबाजी का सामना करना पड़ा, जब उन्होंने यूजीसी नियमों पर स्पष्ट रुख अपनाने से परहेज किया। इसी दौरान भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्यपाल कलराज मिश्रा ने भी यूजीसी नियमों और समुदाय से जुड़ी चिंताओं पर अपनी बात रखी।

इन घटनाओं के बाद कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्य के सत्ता ढांचे में ब्राह्मण समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर बहस तेज हुई है। हालांकि भाजपा नेताओं का कहना है कि ब्राह्मणों की नाराजगी की बातें विपक्ष द्वारा राजनीतिक लाभ के लिए बढ़ा-चढ़ाकर पेश की जा रही हैं।

इस बीच समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और कांग्रेस भी ब्राह्मण मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए सक्रिय दिखाई दे रही हैं। बहुजन समाज पार्टी ने आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अपने पहले प्रत्याशी की घोषणा करते हुए एक ब्राह्मण उम्मीदवार को मैदान में उतारकर स्पष्ट संकेत देने की कोशिश की है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि 2007 में मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी और 2012 में अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने में ब्राह्मण मतदाताओं का समर्थन अहम माना जाता है।

पार्टी सूत्रों के अनुसार भाजपा नेतृत्व ने अपने कुछ ब्राह्मण नेताओं को अनौपचारिक तौर पर सलाह दी है कि वे ऐसे सामुदायिक कार्यक्रमों से दूरी बनाए रखें, जहां यूजीसी या जातीय प्रतिनिधित्व जैसे संवेदनशील मुद्दों पर टकराव की स्थिति बन सकती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कुछ मुद्दों को लेकर ब्राह्मणों में नाराजगी हो सकती है, लेकिन फिलहाल उनके सामने कोई मजबूत राजनीतिक विकल्प नहीं दिखता। उनके अनुसार, यह बहस अभी राजनीतिक बदलाव से ज्यादा धारणा की लड़ाई प्रतीत होती है।

हालाकि भाजपा ने ब्राह्मणों की नाराज़गी को लेकर आक्रामक तरीके से जवाब देने से ज़्यादातर परहेज़ किया है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पार्टी लीडरशिप इस मामले को लेकर काफ़ी संवेदनशील और सजग है क्योंकि पार्टी कोई भी ऐसा क़दम उठाना नहीं चाहती जिससे उसे फ़ज़ीहत का सामना करना पड़े।

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