कोटा , जनवरी 22 -- राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ किसनराव बागडे ने आधुनिक भारतीय भाषा में सिंधी भाषा को संस्कृत के सर्वाधिक निकट बताते हुए गुरुवार को कहा कि युवा पीढ़ी सिंधी भाषा, संस्कृति और परम्पराओं को व्यवहार में जीवित रखे।
श्री बागडे आज कोटा विश्वविद्यालय के नागार्जुन सभागार में सिंधी संस्कृति, अध्ययन एवं परम्परा विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा प्राचीनतम भाषा है और सभी भाषाओं की जननी मानी जाती है। देश में जितनी भी भाषाएं हैं उनमें संस्कृत भाषा के शब्द आते हैं। आधुनिक भारतीय भाषा में सिंधी भाषा संस्कृत के सर्वाधिक निकट है। इसके 70 प्रतिशत शब्द संस्कृत भाषा से मिलते हैं।
उन्होंने कहा कि भारत भाषा की विविधता और संस्कृति की सुगंध के कारण विश्व के श्रेष्ठ देशों में शामिल है। भाषाओं की विविधता में एकता की डोर से हम सभी देशवासी बंधे हुए हैं। संगोष्ठी का आयोजन राष्ट्रीय सिंधी भाषा परिषद एवं सिंधु अध्ययन शोध पीठ, कोटा विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।
राज्यपाल ने कहा कि विश्व की तीन शुरुआती सभ्यताओं मिश्र, मेसोपोटामिया और सिंधु घाटी सभ्यता में से सिंधु घाटी की सभ्यता व्यापक थी वहां जो शहर थे वे परिष्कृत थे और उन्नति के उच्च स्तर को प्रदर्शित करते थे। यह सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में रही है।
उन्होंने कहा कि सिंधी सभ्यता एवं संस्कृति के अध्ययन पर आयोजित इस संगोष्ठी के माध्यम से आमजन को सिंधी भाषा, संस्कृति एवं उनकी समृद्ध परम्पराओं के बारे में जानकारी मिलेगी। उन्होंने कहा कि सिंधी संस्कृति जितनी समृद्ध है उतनी ही व्यापारिक कुशलता हमारे सिंधी समाज के लोगों में है जिन्होंने देश विभाजन के समय अपना सब कुछ छोड़कर हिन्दुस्तान को अपनाया और यहां आकर कड़ी मेहनत के बल पर आज व्यापार जगत में अच्छा नाम कमाया है।
श्री बागडे ने कहा कि सिंधी समाज के अध्यात्मिक गुरुओं ने समाज को संगठित करने के साथ ही सिंधी संस्कृति की समृद्ध परम्पराओं को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संत कंवरराम मानवता की सेवा के लिए जाने जाते हैं। साधु वासवानी महान संत हुए जिन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी योगदान दिया।
इस अवसर पर विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने संगोष्ठी में हिंदी के साथ ही सिंधी भाषा में अपने विचार रखते हुए कहा कि 19वीं शताब्दी के विद्वान डा अर्नेस्ट ट्रम्प ने लिखा था कि सिंधी भाषा संस्कृत की शुद्धतम संतान है जिसमें विदेशी तत्व न्यूनतम है। उन्होंने कहा कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं है। यह हमारी पहचान का प्रमाण और आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ी धरोहर है। सिंधी भाषा की समृद्धि और उसकी मधुरता अद्वितीय है। उन्होंने आह्वान किया कि प्रत्येक सिंधी परिवार एक संकल्प ले कि घरों में प्रतिदिन आधा घण्टा केवल सिंधी भाषा में बात होगी।
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