(जयंत रॉय चौधरी से)नयी दिल्ली , जून 15 -- अमेरिका-ईरान के बीच शुक्रवार को शांति समझौते पर हस्ताक्षर होने की संभावना के साथ ही, भारत ईरान और अन्य खाड़ी देशों के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को फिर से शुरू करने की दिशा में देख रहा है। इसमें तेल की खरीद, खाड़ी क्षेत्र में युद्ध से तबाह हुए बुनियादी ढांचों के पुनर्निर्माण में भाग लेना और रणनीतिक चाबहार बंदरगाह पर कार्गो संचालन को फिर से शुरू करना शामिल है।

भारत विशेष रूप से पश्चिम एशिया और पूर्वी यूरोप से अनुकूल दरों पर उर्वरक के आयात के लिए वार्ताओं को अंतिम रूप देने की उम्मीद कर रहा है, जो उसकी मानसून फसल की सफलता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। अब दोनों पक्ष बिना किसी बाधा के जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति देंगे। शीर्ष अधिकारियों ने बताया कि भारत इस समझौता कूटनीति पर नजर बनाये हुए है। वह इसका बारीकी से अध्ययन करेगा और व्यापार को बढ़ावा देने के साथ-साथ 'बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण कार्य में भाग लेने' के लिए भारतीय उद्योग जगत तथा पश्चिम एशिया में स्थित भारतीय दूतावासों के साथ मिलकर काम करेगा। होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी संकट के कारण यह व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ था।

विदेश मंत्रालय में पूर्व सचिव (आर्थिक संबंध) पिनाक आर. चक्रवर्ती ने 'यूनीवार्ता' से कहा, "ईरानी तेल और चाबहार बंदरगाह के उपयोग में हमारा हित बरकरार है। हमें हालांकि बारीकी से इसकी बारीकियों का अध्ययन करना होगा।" राजनयिक ने यह भी उल्लेख किया कि भारत का 15 प्रतिशत वैश्विक व्यापार खाड़ी देशों से आता या जाता है, इसलिए तीन महीने लंबे चले इस संकट ने भारतीय व्यवसायों को भारी नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने कहा, "यदि यह शांति बनी रहती है, तो हमें नुकसान की भरपाई करने और हमारी अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण कच्चे तेल, गैस और उर्वरक की आपूर्ति प्राप्त करने का अवसर मिलेगा।"युद्ध के बढ़ने के साथ ही संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), सऊदी अरब और कतर को होने वाले भारत के निर्यात में भारी गिरावट आयी थी, जिससे निर्यात और आयात दोनों प्रभावित हुए थे। अकेले मार्च महीने में ही यूएई को होने वाले निर्यात में 62 प्रतिशत की जबरदस्त गिरावट दर्ज की गयी थी।

भारत को अगस्त तक 1.7 करोड़ टन यूरिया की आवश्यकता है, जब देश में खरीफ यानी मानसून की फसल बोई जाती है। घरेलू उत्पादन और राज्यों, कृषि सहकारी समितियों तथा उर्वरक कंपनियों के पास उपलब्ध स्टॉक इस मांग को पूरा करने के लिए नाकाफी है। भारतीय कृषि की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अगले डेढ़ महीने के भीतर लगभग 20 लाख टन की इस कमी को आयात के जरिये पूरा करना होगा।

भारतीय विदेशी व्यापार संस्थान (आईआईएफटी) में डब्ल्यूटीओ के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर बिस्वजीत धर ने कहा, "हमें उम्मीद है कि उर्वरकों की कीमतें, जो वसंत ऋतु में लगभग 419 अमेरिकी डॉलर (करीब 39.5 हजार रुपये) प्रति टन से बढ़कर 850 अमेरिकी डॉलर (करीब 80.5 हजार रुपये) के उच्चतम स्तर को पार कर गयी थीं, जो अब नीचे आयेगी। साथ ही, डॉलर के मुकाबले रुपये के मजबूत होने की उम्मीद है, जिससे हमारा बिल कम होगा। नाकेबंदी समाप्त होने से यूरिया, पोटाश आदि जैसी हमारी उर्वरक आवश्यकताओं को लाने में भी आसानी होगी और समय की बचत होगी।"भारत के पास चाबहार में 'शाहिद बेहश्ती टर्मिनल' के लिए 10 साल का परिचालन अनुबंध भी है, जो 2034 तक चलेगा, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण इस बंदरगाह पर परिचालन गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है। श्री चक्रवर्ती ने कहा, "हमें यह देखना होगा कि हस्ताक्षर होने वाले अंतिम समझौते में प्रतिबंधों को हटाया जाता है या नहीं।" फारस की खाड़ी के मुहाने पर रणनीतिक रूप से स्थित इस बंदरगाह में लगभग 12 करोड़ अमेरिकी डॉलर (11 अरब 35 करोड़ 56 लाख रुपये) का निवेश करने वाला भारत, निश्चित रूप से इसका नियंत्रण किसी स्थानीय ईरानी कंपनी को सौंप सकता है, लेकिन वह इस बंदरगाह को अपने तरीके से संचालित करना पसंद करेगा। भारत इसका उपयोग न केवल ईरान के साथ व्यापार के लिए, बल्कि मध्य एशियाई देशों के साथ व्यापार के लिए भी करना चाहता है।

पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा, "भारत ईरानी कच्चे तेल का एक नियमित खरीदार हुआ करता था और वर्ष 2016-17 में देश के कुल कच्चे तेल के आयात में इसकी हिस्सेदारी लगभग 13 प्रतिशत थी। अमेरिकी प्रतिबंध कड़े होने के बाद यह गिरकर नगण्य रह गयी थी और इस वर्ष अप्रैल में यह फिर से शुरू हो गयी , क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों को स्थिर करने के लिए अमेरिका ने प्रतिबंधों में ढील दी है. हमें उम्मीद है कि हम अपने बास्केट को संतुलित करने के लिए ईरान से अधिक कच्चा तेल खरीद सकेंगे, जिसमें से लगभग एक-तिहाई हम रूस से और बाकी अफ्रीका, पश्चिम एशिया तथा अमेरिका से लेते हैं।"भारतीय समयानुसार सोमवार तड़के, अमेरिका-ईरान ने एक प्रारंभिक रूपरेखा समझौते की घोषणा की है, जिसका उद्देश्य तीन महीने से अधिक समय से जारी शत्रुता को समाप्त करना, ईरान के खिलाफ अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी को हटाना और होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही बहाल करना है। इस बड़ी कामयाबी ने, जिसे अभी भी औपचारिक संपुष्टि की आवश्यकता है, वैश्विक तेल कीमतों में तत्काल गिरावट ला दी है, क्योंकि बाजारों ने खाड़ी क्षेत्र में तनाव कम होने की संभावना पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम का भविष्य हालांकि अब भी अनसुलझा है और इस पर वार्ताओं के एक अलग दौर में चर्चा की जायेगी।

ईरानी मीडिया संस्थानों ने रिपोर्ट दी है कि समझौते की शर्तों के तहत ईरान पर लगायी गयी नौसैनिक नाकेबंदी को तत्काल और पूरी तरह से हटा दिया जायेगा। भारतीय समयानुसार शाम पांच बजे, अगस्त डिलीवरी के लिए ब्रेंट क्रूड वायदा की कीमत पांच प्रतिशत से अधिक गिरकर 83.94 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल पर आ गयी। संघर्ष के शुरुआती दिनों में, मार्च महीने में बेंचमार्क कच्चे तेल की कीमत 120 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल को पार कर गयी थी।

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