नैप्यीडॉ/ढाका , अगस्त 15 -- म्यांमार की सैन्य समर्थित सरकार ने बंगलादेश की ओर से भेजी गयी सूची में शामिल चार लाख 26 हजार से अधिक रोहिंग्या शरणार्थियों का सत्यापन करने और इनमें से तीन लाख आठ हजार 797 को पश्चिमी रखाइन राज्य के पूर्व निवासी के रूप में स्वीकार करने की बात कही है।
म्यांमार ने कहा है कि रखाइन में सुरक्षा की स्थिति सुधरने के बाद सत्यापित लोगों की वापसी की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
म्यांमार के विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान ऐसे समय आया है जब रोहिंग्या शरणार्थी संकट को नौ वर्ष पूरे होने वाले हैं। वर्ष 2017 में म्यांमार की सैन्य कार्रवाई के बाद बड़ी संख्या में रोहिंग्या देश छोड़कर बंगलादेश पहुंचे थे और तब से लाखों लोग वहां शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं।
इस कार्रवाई के बाद सात लाख से ज़्यादा रोहिंग्या बंगलादेश पहुंचे और उन लाखों लोगों के साथ शामिल हो गये जो हिंसा के शुरुआती दौर में ही म्यांमार से भाग गये थे। साल 2017 की कार्रवाई के बड़े पैमाने और क्रूरता को देखते हुए, संयुक्त राष्ट्र ने म्यांमार की सरकार तथा सेना पर जातीय सफाये और नरसंहार का आरोप लगाया था।
म्यांमार प्रशासन आधिकारिक तौर पर रोहिंग्या समुदाय को अपने 135 कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त जातीय समूहों में से एक नहीं मानता है, बल्कि उन्हें बस "बंगाली" कहता है, जिसका मतलब है कि वे बंगलादेश से आये अवैध प्रवासी हैं।
बयान के अनुसार, बंगलादेश ने सत्यापन के लिए आठ लाख 28 हजार 824 शरणार्थियों की सूची म्यांमार को सौंपी थी। जुलाई के अंत तक म्यांमार ने चार लाख 26 हजार 545 लोगों का सत्यापन किया, जिनमें से तीन लाख आठ हजार 797 को रखाइन के पूर्व निवासी माना गया।
म्यांमार के अनुसार, एक लाख 13 हजार 507 लोगों का सत्यापन नहीं हो सका, जबकि 4,241 लोगों के बारे में कहा गया कि वे ऐसी गतिविधियों में शामिल रहे हैं जिन्हें म्यांमार ने आतंकवादी गतिविधियां बताया है।
म्यांमार के विदेश मंत्रालय ने कहा कि रखाइन में सुरक्षा स्थिति स्थिर होने के बाद सत्यापित पूर्व निवासियों की वापसी की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए बंगलादेश के साथ काम जारी रखा जाएगा।
म्यांमार सरकार ने रखाइन से 10 लाख से अधिक लोगों के विस्थापित होने के दावों को भी खारिज किया। उसका कहना है कि 2017 की हिंसा के बाद पांच लाख 40 हजार से अधिक लोग बंगलादेश गये, जबकि दो लाख से अधिक लोग उत्तरी रखाइन में ही रह गये।
म्यांमार और बंगलादेश ने 2018 में रोहिंग्या शरणार्थियों की दो वर्ष की अवधि में वापसी शुरू करने पर सहमति जतायी थी, हालांकि सुरक्षा स्थिति लगातार बिगड़ने के कारण अब तक वापसी की सभी कोशिशें विफल रही हैं।
वर्ष 2021 में म्यांमार की सेना के सत्ता में आने के बाद स्थिति और खराब हो गयी। सेना ने तत्कालीन लोकतांत्रिक सरकार को हटा दिया और इसके बाद देश में व्यापक गृहयुद्ध शुरू हो गया, जो अब तक जारी है।
रखाइन राज्य में सेना और अराकान आर्मी के बीच जारी संघर्ष ने रोहिंग्या शरणार्थियों की वापसी को और मुश्किल बना दिया है। वर्ष 2023 में संघर्ष तेज होने के बाद बड़ी संख्या में लोगों को फिर से अपने घर छोड़ने पड़े। अराकान आर्मी ने सेना से लड़ते हुए रखाइन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है।
म्यांमार सरकार रोहिंग्या समुदाय को देश की 135 आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त जातीय समूहों में शामिल नहीं करती और उन्हें सामान्य तौर पर "बंगाली" कहती है। इससे यह संकेत मिलता है कि वह उन्हें बंगलादेश से आए अवैध प्रवासी मानती है।
वर्ष 2017 में म्यांमार की सैन्य कार्रवाई के बाद सात लाख से अधिक रोहिंग्या बंगलादेश पहुंचे थे। संयुक्त राष्ट्र ने उस कार्रवाई के पैमाने और उसमें हुई हिंसा को जातीय सफाये और नरसंहार की आशंकाओं से जोड़ा था।
बंगलादेश में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए शिविरों की स्थिति भी लगातार चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। विदेशी सहायता में कमी, खराब जीवन परिस्थितियों और सुरक्षित वापसी की विश्वसनीय गारंटी नहीं होने के कारण कई शरणार्थी मलेशिया और इंडोनेशिया पहुंचने के लिए खतरनाक समुद्री यात्राओं का सहारा ले रहे हैं। वे अक्सर क्षमता से अधिक भरी और असुरक्षित नौकाओं में यात्रा करते हैं।
इस बीच, अन्य देशों में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों की वापसी को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने जुलाई के अंत में कहा था कि म्यांमार मलेशिया में रह रहे पांच हजार रोहिंग्या शरणार्थियों को एक पुनर्वास कार्यक्रम के तहत वापस लेने पर सहमत हुआ है।
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