जयंत चौधरी सेनयी दिल्ली , फरवरी 24 -- उत्तरी म्यांमार में मौजूद दुर्लभ खनिज संपदा को ध्यान में रखते हुए भारत द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बनी ऐतिहासिक स्टिलवेल रोड के एक हिस्से को पुनर्जीवित करने की संभावनाएं तलाश रहा है।
भारतीय अधिकारियों ने उस क्षेत्र को नियंत्रित करने वाली काचिन विद्रोही ताकतों के साथ-साथ म्यांमार सरकार से भी बातचीत की है। इस दौरान क्षेत्र से दुर्लभ खनिजों के कुछ नमूने प्राप्त किये गये हैं, जिनमें डिस्प्रोसियम और टर्बियम शामिल हैं। इनका उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों, सटीक-निर्देशित मिसाइलों, लड़ाकू विमानों के मोटर, सोनार सिस्टम, ड्रोन और सैटेलाइट संचार उपकरणों के निर्माण में किया जाता है।
वर्तमान में म्यांमार से दुर्लभ खनिजों के व्यापार पर चीन का प्रभावी नियंत्रण है। इन खनिजों का बड़ा हिस्सा काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी (केआईए) के नियंत्रण वाले इलाकों से आता है। यह संकेत मिलने के बाद कि विक्रेता अपने निर्यात को विविध बनाने के इच्छुक हो सकते हैं, भारत में नये सिरे से विचार-विमर्श शुरू हो गया है।
अधिकारियों ने बताया कि असम के तिनसुकिया जिले के लेदो से अरुणाचल प्रदेश में भारत-म्यांमार सीमा स्थित पांगसाउ दर्रे तक सड़क की स्थिति अच्छी है। इसके आगे म्यांमार के सगाइंग प्रांत से होते हुए उत्तरी काचिन राज्य के मायित्कीना तक जाने वाला मार्ग उपयोग योग्य तो है, लेकिन उसे मरम्मत और चौड़ीकरण की आवश्यकता होगी।
करीब 1,700 किलोमीटर लंबी स्टिलवेल सड़क का निर्माण द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी जनरल जोसेफ 'विनिगर' स्टिलवेल के नेतृत्व में एक सामरिक आपूर्ति मार्ग के रूप में किया गया था। युद्ध के बाद यह मार्ग जंगलों में दब गया और म्यांमार विभिन्न जातीय सशस्त्र समूहों के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में बंट गया। फिलहाल जिन योजनाओं पर विचार हो रहा है, वह लेदो से मायित्कीना तक लगभग 400 किलोमीटर के हिस्से से संबंधित हैं।
मायित्कीना काचिन प्रांत के केन्द्र में स्थित है और यहां से प्रांत में कम से कम 300 खनन स्थलों से निकाले जाने वाले दुर्लभ खनिजों का बड़ा व्यापार नियंत्रित होता है। काचिन क्षेत्र जेड, सोना और एंबर जैसे खनिजों से भी समृद्ध है, लेकिन वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक आकर्षण दुर्लभ खनिजों को लेकर है। इन्हीं खनिजों पर चीन का नियंत्रण माना जाता है।
अधिकारियों ने आशंका जताई कि विद्रोही समूहों और म्यांमार की सैन्य सरकार के बीच जारी संघर्ष इस परियोजना के लिए चुनौती बना रह सकता है। मार्ग जिन इलाकों से गुजरता है, वहां आपूर्ति की आवाजाही विद्रोही नियंत्रण के कारण प्रभावित हो सकती है। इसके बावजूद, उनका कहना है कि स्थानीय समुदायों के बीच भारत के प्रति सकारात्मक भावना एक अनुकूल कारक हो सकती है।
दुर्लभ खनिज 17 धात्विक तत्वों का समूह है, जो आधुनिक तकनीक में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, विशेषकर शक्तिशाली स्थायी मैग्नेट बनाने में। इनमें 'हेवी रेयर अर्थ एलिमेंट्स' उन्नत रक्षा प्रणालियों और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
वर्ष 2023 में म्यांमार चीन के लिए भारी दुर्लभ खनिजों का प्रमुख बाहरी आपूर्तिकर्ता था, जिसने चीन के आयात का लगभग 98 प्रतिशत हिस्सा प्रदान किया। उस साल 9,000 टन से अधिक सांद्रित सामग्री की आपूर्ति की गयी थी।
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