नयी दिल्ली , अक्टूबर 11 -- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि दी। उन्होंने इस वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी और समाजवादी नेता के कई पीढ़ियों पर पड़े गहरे प्रभाव,आपातकाल के खिलाफ उनके कड़े विरोध और सुशासन तथा समाज के पिछड़े वर्गों के उत्थान के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को याद किया।

श्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक पोस्ट में कहा कि श्री नारायण ने लोगों को सार्वजनिक जीवन को देश के नवनिर्माण के एक माध्यम के रूप में देखने के लिए प्रेरित किया। तानाशाही के खिलाफ उनका विरोध भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का एक अहम अध्याय बना हुआ है।

प्रधानमंत्री ने कहा, "उनका प्रभाव कई पीढ़ियों तक रहा। उन्होंने लोगों को यह विश्वास दिलाया कि सार्वजनिक जीवन देश के नवनिर्माण का एक साधन हो सकता है। इमरजेंसी के दौरान उनकी निडर आवाज़ भी उल्लेखनीय थी।"श्री मोदी ने जवाबदेह शासन और सामाजिक समावेश पर श्री नारायण के ज़ोर का भी ज़िक्र किया और उनके आदर्शों को एक विकसित भारत बनाने के सरकार के लक्ष्य से जोड़ा।

उन्होंने कहा, "लोकनायक जेपी सुशासन सुनिश्चित करने और समाज के हाशिए पर रहने वाले लोगों तक पहुँचने के लिए भी बहुत उत्साहित थे। 'विकसित भारत' बनाने की दिशा में काम करते हुए हम उनके आदर्शों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।"जेपी या लोकनायक के नाम से मशहूर जयप्रकाश नारायण भारत के स्वतंत्रता संग्राम और आज़ादी के बाद के राजनीतिक जीवन की सबसे अहम हस्तियों में से एक थे। एक समाजवादी विचारक और लोकतांत्रिक जवाबदेही के समर्थक के तौर पर वे 1970 के दशक में भ्रष्टाचार और राजनीतिक सत्ता के केंद्रीकरण के खिलाफ आंदोलन में एक मुख्य चेहरा बने।

'संपूर्ण क्रांति' के उनके आह्वान ने छात्रों, युवाओं और विपक्षी समूहों - खासकर बिहार में - को एकजुट किया और बाद में यह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ एक बड़े राष्ट्रीय आंदोलन में बदल गया।

श्री नारायण के अभियान का मकसद दूरगामी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक सुधार लाना था, जिसमें उन्होंने देश के लिए अपने विज़न के केंद्र में सार्वजनिक जवाबदेही और लोगों की भागीदारी को रखा।

25 जून 1975 को इमरजेंसी लागू होने के बाद, वे नागरिक स्वतंत्रता के निलंबन, प्रेस पर पाबंदियों और विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ संघर्ष में सबसे आगे आ गए। खराब सेहत के बावजूद, नारायण ने सरकार के कामों को चुनौती देना जारी रखा और लोकतांत्रिक आज़ादी को बहाल करने की मांग की।

उनकी कोशिशों से अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा वाली विपक्षी पार्टियां आपातकाल के खिलाफ एक साझा अभियान के लिए एकजुट हो पाईं। 1977 के आम चुनाव में जनता पार्टी की जीत, जिसने केंद्र में कांग्रेस के शासन को खत्म किया, भारत के चुनावी इतिहास में एक अहम घटना साबित हुई। इसने लोकतांत्रिक अधिकारों को निलंबित करने के खिलाफ व्यापक विरोध के राजनीतिक नतीजों को दिखाया।

हालांकि श्री नारायण ने कोई सरकारी पद नहीं लिया, लेकिन कांग्रेस सरकार को चुनौती देने वाली ताकतों को एकजुट करने में उनका नैतिक प्रभाव और नेतृत्व अहम रहा।

श्री नारायण की विरासत इस सोच से गहराई से जुड़ी है कि लोकतंत्र का दायरा सिर्फ़ समय-समय पर होने वाले चुनावों से कहीं ज़्यादा बड़ा होना चाहिए, यह नैतिक सार्वजनिक आचरण, संस्थागत जवाबदेही और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी पर टिका होना चाहिए। उनकी राजनीतिक सोच में सामाजिक न्याय और यह सुनिश्चित करने पर भी ज़ोर दिया गया कि पिछड़े समुदायों को विकास के लाभों से वंचित न रखा जाए।

श्री मोदी की श्रद्धांजलि ने इन सिद्धांतों को सरकार के 'विकसित भारत' विजन के दायरे में रखा और सुशासन तथा सामाजिक समावेश पर नारायण के ज़ोर की निरंतर प्रासंगिकता को रेखांकित किया।

उनकी जयंती ने उनकी राजनीतिक विरासत के महत्व को भी फिर से उजागर किया, खासकर तानाशाही के खिलाफ उनके विरोध और इस दृढ़ विश्वास को कि सार्वजनिक जीवन व्यापक राष्ट्रीय हित के लिए समर्पित होना चाहिए।

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