नयी दिल्ली , अगस्त 27 -- कर्नाटक के मैसुरु में आयोजित जनजातीय भाषाओं और संग्रहालयों के राष्ट्रीय सम्मेलन में जनजातीय भाषाओं, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण तथा संवर्धन पर विशेषज्ञों, अधिकारियों और समुदाय के प्रतिनिधियों ने विचार-विमर्श किया।
जनजातीय कार्य मंत्रालय ने गुरुवार को बताया कि सम्मेलन के दौरान जनजातीय संग्रहालयों और जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों (टीएफएफएम) की भूमिका पर विशेष चर्चा हुई। वक्ताओं ने प्रामाणिक कहानी-प्रस्तुति, सामुदायिक भागीदारी और आधुनिक संग्रहालय तकनीकों के माध्यम से जनजातीय इतिहास और पहचान को संरक्षित करने पर जोर दिया।
जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों पर आयोजित सत्रों की शुरुआत जनजातीय कार्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव टी. रूमुआन पाइते के संबोधन से हुई। उन्होंने कहा कि संग्रहालय इतिहास के महत्वपूर्ण भंडार हैं, जहां दस्तावेजों, वस्तुओं, तस्वीरों और अन्य ऐतिहासिक साक्ष्यों को संरक्षित किया जाता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संग्रहालयों में केवल वस्तुओं का संरक्षण पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनसे जुड़ी कहानियों, संदर्भों और उनके सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व को भी सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
जनजातीय कार्य मंत्रालय की निदेशक दीपाली मसीरकर ने जनजातीय संग्रहालयों और जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ऐसे संग्रहालय जनजातीय समुदायों की समृद्ध विरासत और विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को समकालीन एवं आकर्षक तरीके से सामने रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रतिभागियों को भोपाल स्थित जनजातीय संग्रहालय का उदाहरण देते हुए संग्रहालयों में भौतिक प्रदर्शनियों और डिजिटल माध्यमों के बीच संतुलन की आवश्यकता से अवगत कराया गया।
मानव विकास संस्थान के विजिटिंग प्रोफेसर प्रो. वर्जिनियस ज़ाक्सा ने 'संग्रहालयों में आदिवासी स्वतंत्रता कथाओं का प्रतिनिधित्व: प्रामाणिकता, पहचान और सामुदायिक परिप्रेक्ष्य' विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने आदिवासी इतिहास के प्रामाणिक प्रतिनिधित्व और स्थानीय आदिवासी कथाओं को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया। इंडिया विजन इंस्टीट्यूट के सीईओ एवं प्रबंध न्यासी विनोद डेनियल ने संग्रहालयों को जीवंत संस्थानों के रूप में विकसित करने पर चर्चा की।
आईजीआरएमएस के अमिताभ पांडे ने संग्रहालय नियोजन, कथा विकास, स्थानिक नियोजन तथा भविष्य के संचालन और रखरखाव से जुड़े पहलुओं पर जानकारी दी।
भोपाल स्थित वीर भारत न्यास के निदेशक श्रीराम तिवारी ने जनजातीय संग्रहालयों के निर्माण और संचालन में समुदाय की भागीदारी को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने सतत संग्रहालय प्रबंधन के लिए आगंतुक सहभागिता, संस्थागत साझेदारी, राजस्व सृजन और संसाधन जुटाने जैसे पहलुओं पर विचार साझा किये।
समापन सत्र में दीपाली मसीरकर ने संग्रहालयों को अधिक जीवंत और टिकाऊ बनाने के लिए कई सुझाव दिये। इनमें समुदायों की निरंतर भागीदारी, राजस्व सृजन के लिए लाइट शो, अतिथि गृह सुविधाओं का विकास, सप्ताहांत कार्यक्रमों का आयोजन तथा जनजातीय व्यंजनों और जनजातीय कॉफी वाले कैफे विकसित करना शामिल है। उन्होंने कहा कि इस तरह की पहल से संग्रहालयों में आगंतुकों की सहभागिता बढ़ाने के साथ उनकी आर्थिक स्थिरता भी सुनिश्चित की जा सकती है।
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