चेन्नई , सितंबर 23 -- मद्रास उच्च न्यायालय ने कावेरी नदी पर मेकेदातु में कर्नाटक के संतुलन जलाशय परियोजना बनाने के कदम का विरोध करते हुए एक नया न्यायाधिकरण बनाने की मांग वाले प्रस्ताव के खिलाफ दाखिल अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (अन्नाद्रमुक) की याचिका बुधवार को खारिज कर दी।

न्यायमूर्ति एस.ए. धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की पीठ ने दोनों पक्षों की अंतिम सुनवाई के बाद पूर्व मंत्री एवं राज्य विधानसभा में अन्नाद्रमुक के व्हिप एग्री एस.एस. कृष्णमूर्ति की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि वह विधानसभा के कामकाज में दखल नहीं दे सकती।

दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद पीठ ने नौ सितंबर को अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था।

सुनवाई के दौरान, राज्य की ओर से पेश महाधिवक्ता ने विधानसभा की कार्यवाही के वीडियो फुटेज का हवाला देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री ने विपक्ष के नेता का सुझाव मान लिया था और उसे प्रस्ताव में शामिल करने का अनुरोध किया था। इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष ने संशोधित प्रस्ताव को वोटिंग के लिए रखा और संशोधन पेश किये जाने पर किसी भी सदस्य ने कोई आपत्ति नहीं जतायी।

महाधिवक्ता ने कहा कि संवैधानिक पाबंदियों के कारण अदालत में विधानसभा की कार्यवाही पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। साथ ही, चूंकि यह प्रस्ताव केंद्र से किया गया एक अनुरोध था, इसलिए इसे न्यायिक समीक्षा के योग्य विधायी फैसले के तौर पर चुनौती नहीं दी जा सकती।

गौरतलब है कि 19 जून को राज्य विधानसभा में मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय की ओर से पेश प्रस्ताव पर बहस खत्म होने और उसे अपनाने से पहले विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन के सुझाव पर एक संशोधन शामिल किया गया था। इस संशोधन में केंद्र से मेकेदातु बांध विवाद को सुलझाने के लिए एक नया न्यायाधिकरण बनाने का आग्रह किया गया था।

अन्नाद्रमुक और उसके सहयोगी पीएमके के साथ-साथ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने इस संशोधन का विरोध किया। उनका कहना था कि यह सदस्यों को बांटे गये मूल/ड्राफ्ट प्रस्ताव का हिस्सा नहीं था। संशोधन को शामिल करते हुए प्रस्ताव को राज्य विधानसभा में ध्वनि मत से सर्वसम्मति से पारित किया गया, जबकि द्रमुक ने बहस में भाग लेने और अपना पूरा समर्थन देने के बाद वोटिंग के दौरान सदन से बहिर्गमन किया। सुनवाई के दौरान सरकार ने कहा कि प्रस्ताव को याचिकाकर्ता और उनकी पार्टी की सहमति से विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित किया गया था।

सरकार ने कहा कि सदन में प्रस्ताव का समर्थन करने के बाद श्री कृष्णमूर्ति अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा सकते थे। अन्नाद्रमुक के व्हिप ने अपनी याचिका में उस संशोधन को रद्द करने की मांग की जिसमें मेकेदातु मुद्दे पर फैसला करने के लिए एक अलग न्यायाधिकरण बनाने की बात कही गयी थी। उन्होंने कहा कि बहस के दौरान, श्री उदयनिधि के न्यायाधिकरण बनाने के सुझाव को मुख्यमंत्री ने शामिल किया और प्रस्ताव को ध्वनि मत से पारित कर दिया गया।

अन्नाद्रमुक ने आरोप लगाया कि संशोधन विधायकों को बांटे गए मूल प्रस्ताव का हिस्सा नहीं था और इसे उचित बहस के बिना पारित किया गया था। पार्टी ने यह भी दावा किया कि पीएमके और भाकपा सहित कई पार्टियों के विरोध के बावजूद, बाद में केंद्र को यह बताया गया कि प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ था।

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