हैदराबाद , मार्च 22 -- महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के सलाहकार और केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के पूर्व सलाहकार वेदिरे श्रीराम ने मूसी नदी के पुनर्जीवन के लिए वैज्ञानिक और पारिस्थितिकी-आधारित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस परियोजना को केवल नदी तट सौंदर्यीकरण तक सीमित रखना उचित नहीं होगा।

श्री श्रीराम ने रविवार को राजभवन रोड स्थित एक निजी होटल में भाजपा की तेलंगाना इकाई द्वारा आयोजित "मूसी नदी का पुनरुद्धार: तथ्य" विषय पर चर्चा कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि वास्तविक नदी पुनर्जीवन का मतलब नदी को एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में बहाल करना है, जहां बेहतर जल गुणवत्ता और जलीय जीवों की वापसी सफलता के संकेत होते हैं।

श्री श्रीराम ने बताया कि नदी एक जटिल प्रणाली है, जिसमें भूमिगत जलधाराएं, भूजल, तलछट प्रवाह, मौसमी बदलाव और तटीय क्षेत्र (रिपेरियन ज़ोन) शामिल होते हैं, जो प्राकृतिक फिल्ट्रेशन और जैव विविधता के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि इन पहलुओं की अनदेखी कर केवल कंक्रीट ढांचे पर ध्यान देने से नदी का पारिस्थितिक संतुलन और बिगड़ सकता है।

उन्होंने तीन चरणों में एक व्यापक योजना का प्रस्ताव रखा, जिसमें ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र, हैदराबाद का शहरी हिस्सा और निचले प्रवाह क्षेत्र शामिल हैं। ऊपरी क्षेत्रों में फीडर नदियों को बहाल करने के लिए 'रिज-टू-वैली' दृष्टिकोण अपनाने, चेक डैम और जल संरक्षण संरचनाएं बनाने पर जोर दिया।

शहर के हिस्से के लिए उन्होंने बिना उपचारित सीवेज को सबसे बड़ी समस्या बताते हुए इंटरसेप्टर सिस्टम लगाने की सलाह दी, ताकि केवल शुद्ध पानी ही नदी में पहुंचे। साथ ही, बफर ज़ोन को वैज्ञानिक तरीके से तय करने और बड़े पैमाने पर लोगों के विस्थापन से बचने की बात कही।

निचले क्षेत्रों जैसे नलगोंडा और मिर्यालगुडा पर प्रभाव का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि गिरती जल गुणवत्ता से खेती, पशुधन और जनस्वास्थ्य प्रभावित हो रहे हैं। इसके समाधान के लिए डी-सिल्टिंग, वेटलैंड विकास और प्राकृतिक शुद्धिकरण प्रणाली अपनाने की जरूरत बताई।

उन्होंने पूरे नदी तंत्र की निगरानी के लिए 'मूसी रिवर बेसिन अथॉरिटी' गठित करने और जल गुणवत्ता के आंकड़ों को रियल-टाइम में सार्वजनिक करने की सिफारिश की। साथ ही, उन्होंने कहा कि इस परियोजना की सफलता के लिए विशेषज्ञों, स्थानीय समुदायों और अन्य हितधारकों की व्यापक भागीदारी आवश्यक है।

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