बिलासपुर , मार्च 27 -- छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने मूक-बधिर युवती से दुष्कर्म के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आज आरोपी की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को सही ठहराते हुए आरोपी की अपील खारिज कर दी।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी गवाह के मूक-बधिर होने के आधार पर उसकी गवाही को नकारा नहीं जा सकता। इशारों के माध्यम से दी गई जानकारी भी विधि सम्मत और स्वीकार्य साक्ष्य मानी जाएगी।
मामला बालोद जिले के अर्जुंदा थाना क्षेत्र का है, जहां 29 जुलाई 2020 को 20 वर्षीय मूक-बधिर युवती के साथ उसके ही रिश्तेदार ने घर में घुसकर दुष्कर्म किया था। घटना के समय युवती घर पर अकेली थी। शाम को मां के लौटने पर पीड़िता ने इशारों के माध्यम से पूरी घटना बताई और आरोपी की पहचान की।
परिजनों की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। चूंकि पीड़िता जन्म से ही बोल और सुन नहीं सकती थी, इसलिए उसकी गवाही दर्ज करना चुनौतीपूर्ण रहा। सुनवाई के दौरान अदालत ने सांकेतिक भाषा विशेषज्ञ की सहायता ली, वहीं पीड़िता ने प्लास्टिक की गुड़िया के माध्यम से भी घटना को स्पष्ट किया।
ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी, जिसे हाईकोर्ट ने भी उचित माना। मेडिकल और फॉरेंसिक जांच में भी अपराध की पुष्टि हुई, जिसमें आरोपी के कपड़ों सहित अन्य साक्ष्यों में मानव शुक्राणु पाए गए।
अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2) के तहत आजीवन कारावास (मृत्यु तक) और धारा 450 के तहत पांच वर्ष की सजा तथा 21 हजार रुपये के अर्थदंड से दंडित किया है। आरोपी वर्तमान में जेल में बंद है और उसे पूरी सजा भुगतनी होगी।
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