मुरादाबाद , मार्च 20 -- विश्व गौरैया दिवस के मौके पर उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद मंडल में गौरैया संरक्षण की दो अनोखी पहलें लोगों का ध्यान खींच रही हैं। अमरोहा जिले के गांधी इंटर कॉलेज के प्रवक्ता और पक्षी प्रेमी विनोद रिछारिया ने घर-घर जाकर लोगों को जागरूक किया है कि गौरैया पर्यावरण और प्रकृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

दूसरी ओर, बिजनौर जिले के स्योहारा में शेख अकबर हुसैन की 300 साल पुरानी हवेली में ढाई हजार से अधिक गौरैया और अन्य पक्षी सुरक्षित हैं। यह परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी पक्षियों की देखभाल करता आ रहा है। वर्तमान में परिवार के सदस्य फ़राज़ शेख़, नौमान शेख़ और अफसर चौधरी इस परंपरा को निभा रहे हैं। हवेली में विशेष आयोजन के दौरान युवाओं को मुफ्त घोंसले वितरित किए जाते हैं और उन्हें पक्षियों के संरक्षण के लिए प्रेरित किया जाता है।

अमरोहा जिले के मंडी धनौरा स्थित गांधी इंटर कॉलेज के प्रवक्ता विनोद रिछारिया ने गौरैया के विलुप्त होने की आशंका को देखते हुए संरक्षण का संकल्प लिया है। और पिछले कई सालों से वे लगातार घर-घर जाकर लोगों को बताते हैं कि कैसे छोटी-सी गौरैया हमारे पर्यावरण और प्रकृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उनका कहना है कि दुनिया में इतनी बड़ी संख्या में गौरैयों का एक साथ बसेरा होना बेहद दुर्लभ है, और हमें बिजनौर के स्योहारा स्थित उक्त हवेली के संरक्षण दाताओं से प्रेरणा लेकर अपने घरों में भी घोंसले और दाना-पानी का इंतजाम करना चाहिए।

बिजनौर के स्योहारा नगर के मोहल्ला शेखान में स्थित शेख अकबर हुसैन की हवेली दुनिया भर में पक्षी-प्रेम की जीती-जागती मिसाल है। यहाँ तीन सदी से चली आ रही परंपरा है कि परिवार के बुजुर्ग अंतिम वसीयत में अगली पीढ़ी को बेजुबान परिंदों की देखभाल की जिम्मेदारी सौंप जाते हैं। वर्तमान में शेख ज़माल के बेटे फ़राज़ शेख़, नौमान शेख़ और अफसर चौधरी इस परंपरा को बखूबी निभा रहे हैं।

फ़राज़ शेख़ हर सुबह जल्दी उठकर पक्षियों के लिए दाना-पानी का प्रबंध करते हैं। पक्षियों के प्रति परिवार का समर्पण इतना गहरा है कि शादी-ब्याह या किसी भी समारोह में सभी सदस्य एक साथ शामिल नहीं हो पाते ,हमेशा कोई न कोई हवेली में रहकर परिंदों की सेवा में जुटा रहता है। वे दृढ़ता से कहते हैं, यह हवेली न बिकेगी और न ही गौरैयों का कुनबा बिखरेगा। यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी यूंही चलती रहेगी।

बताते हैं कि हर साल गौरैया दिवस पर यहाँ खास आयोजन होता है। जिसमें परिवार के सदस्यों के साथ साथ बड़ी संख्या में युवा मिलकर केक काटते हैं, और उत्सव मनाते हैं।इस ख़ास मौके पर युवाओं को मुफ्त घोंसले भी वितरित किए जाते हैं, साथ ही गौरैयों के लिए आशियाना बनाने के लिए युवाओं को प्रेरित किया जाता है। हवेली में सिर्फ गौरैयाँ ही नहीं, कई अन्य पक्षी भी संरक्षित हैं, जो इस पंरपरा की जीवंतता का जीता-जागता उदाहरण है।

अमरोहा जिले के मंडी धनौरा में गांधी इंटर कालेज के प्रवक्ता विनोद रिछारिया कहते हैं, गौरैया हमारी सबसे मासूम और घरेलू चिड़िया है। इसका कलरव सुबह की सबसे खूबसूरत आवाज़ों में शुमार है। नर गौरैया का गीत मादा को आकर्षित करने के लिए कोमल और बारीक होता है, जबकि मादा जवाब में गाती है। कुछ प्रजातियाँ गीतों में बदलाव और नकल भी करती हैं, लेकिन अमेरिका की स्वम्प स्पैरो जैसी प्रजातियाँ अपनी हजारों साल पुरानी सांस्कृतिक विरासत को बिना बदले गाती हैं, इन्हें 'सांस्कृतिक गौरैया' कहा जाता है।

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