मुरादाबाद , जुलाई 13 -- उत्तर प्रदेश में 'पीतल नगरी' मुरादाबाद के धातु हस्तशिल्प और निर्यात उद्योग में श्रम बल में महिलाओं की नगण्य संख्या और पारंपरिक कारीगरों का लगातार पलायन इस क्षेत्र के लिए एक गंभीर चुनौती बना हुआ है। हस्तशिल्प निर्यात संवर्धन परिषद (ईपीसीएच) के आंकड़ों के अनुसार, मुरादाबाद में इस समय लगभग 600 पंजीकृत निर्यात इकाइयां, 3,500 पंजीकृत धातु निर्माण इकाइयां और करीब 30 हजार से 40 हजार छोटी इकाइयां सक्रिय हैं, जो क्षेत्र के लाखों लोगों को रोजगार देकर लगभग 7,000 करोड़ रुपये का वार्षिक टर्नओवर अर्जित कर रही हैं। इसके बावजूद, इस विशाल उद्योग में महिला श्रमिकों तथा कारीगरों की भागीदारी बामुश्किल 20 से 25 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकी है, जो सीधे तौर पर समाज में महिलाओं के लिए उपयुक्त और उत्पादक रोजगार के अवसरों की भारी कमी को दर्शाता है।

इस औद्योगिक परिदृश्य में एक बड़ा संकट यह भी उभर कर आया है कि उद्योग की मुख्य रीढ़ माने जाने वाले पुश्तैनी कारीगर लगातार घटते जा रहे हैं, और अपर्याप्त लाभांश के चलते अधिकांश कुशल आर्टिजन अपनी आजीविका जुटाने के लिए ई-रिक्शा चलाने को मजबूर हो गए हैं। इसके साथ ही, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ (आयात शुल्क) के बाद से मुरादाबाद के निर्यात और मुनाफे में जो गिरावट आई थी, उसके झटके से यह उद्योग अभी तक पूरी तरह उबर नहीं पाया है और स्थानीय निर्यातक अब भी वैश्विक नीतियों में ढील तथा टैरिफ कम होने की बाट जोह रहे हैं।

आर्थिक विश्लेषकों और मुरादाबाद हैंडिक्राफ्टस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन एमएचईए चैयरमेन एवं (ईपीसीएच) के (सीओए) सदस्य नवेद उर रहमान का मानना है कि यदि सरकार की सुरक्षात्मक नीतियों और ओडीओपी के त्रिकोणीय तालमेल के बीच स्थानीय स्तर पर महिलाओं के लिए सुरक्षित व समान रोजगार के अवसरों का सृजन किया जाए तथा पारंपरिक कारीगरों को बेहतर आर्थिक सुरक्षा प्रदान की जाए, तभी मुरादाबाद का यह ऐतिहासिक हस्तशिल्प उद्योग अमेरिकी टैरिफ जैसी वैश्विक मंदी के थपेड़ों का मजबूती से सामना करते हुए अंतरराष्ट्रीय पटल पर अपना सतत और समावेशी विकास सुनिश्चित कर सकेगा।

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