मुरादाबाद , अगस्त 31 -- देश को 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजी शासन से आजादी मिली, लेकिन विमुक्त जाति समुदायों के लिए कथित गुलामी की जंजीरें 31 अगस्त 1952 को टूटीं। इसी ऐतिहासिक दिन की स्मृति में सोमवार को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद मंडल में 'समस्त भांतु समाज एकता, सशक्तीकरण और स्वाभिमान' तथा मेरठ और सहारनपुर मंडलों में विमुक्ति दिवस उत्साह के साथ मनाया गया।
मुरादाबाद में मुख्य कार्यक्रम से पूर्व पार्षद राधा रानी और भाजपा नेता हरदीप सिंह ने शहर की पहली जेल के मुख्य द्वार पर ध्वजारोहण कर समारोह का शुभारंभ किया। इस अवसर पर सीआरपीएफ के पूर्व डीआईजी स्वर्गीय बृजनंदन सिंह भांतु और क्रांतिकारी सुल्ताना भांतु के योगदान को याद करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
पार्षद राधा रानी ने बताया कि शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इस दौरान मेधावी छात्र-छात्राओं को जिलाधिकारी राजेंद्र पैंसिया, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक सतपाल अंतिल और विधायक रितेश गुप्ता द्वारा सम्मानित एवं पुरस्कृत किया जाएगा। कार्यक्रम में बाबू ज्ञानचंद, दीपकमल, सुभाषचंद्र, संजीव पुनीत, समर सिंह और जितेंद्र पाल सिंह समेत समाज के कई गणमान्य लोग मौजूद रहे।
यह अभियान केवल भांतु समाज तक सीमित नहीं रहा। मुरादाबाद, मेरठ और सहारनपुर मंडलों में गुर्जर समाज ने भी विमुक्ति जाति दिवस मनाते हुए राज्य सरकार से लंबित विमुक्ति जाति प्रमाण पत्र जारी करने की मांग की। विमुक्ति जाति संघर्ष समिति से जुड़े मोहित तोमर और नरेंद्र कटारिया ने बताया कि विमुक्त, घुमंतू एवं अर्द्धघुमंतू जातियों को सामाजिक और आर्थिक हिस्सेदारी दिलाने के साथ गुर्जर, निषाद समेत 143 जातियों को अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग में शामिल करने की मांग उठाई गई है।
उन्होंने आरोप लगाया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर और मुरादाबाद मंडल में प्रशासनिक स्तर पर गुर्जर समाज के विमुक्ति जाति प्रमाण पत्र बनाए जा रहे थे, लेकिन बाद में बिना स्पष्ट कारण बताए प्रक्रिया को रोक दिया गया। समाज की ओर से ज्ञापन के माध्यम से प्रदेश की 193 विधानसभा सीटों पर आरक्षण देने तथा शिक्षा और रोजगार में उचित हिस्सेदारी सुनिश्चित करने की भी मांग की गई।
संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए कहा कि ब्रिटिश शासन के दौरान 1871 में 'क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट' लागू कर कई जातियों को जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया गया था। उनके अनुसार, अंग्रेजों के शासन का विरोध करने वाले इन समुदायों को इस कानून के जरिए प्रताड़ित किया गया।
उन्होंने कहा कि आजादी के बाद 31 अगस्त 1952 को इस कानून के तहत लगाए गए कलंक को आधिकारिक रूप से समाप्त किया गया, लेकिन विमुक्त, घुमंतू और अर्द्धघुमंतू समुदायों को आज भी सामाजिक और आर्थिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। उन्होंने सरकार से इन समुदायों को शिक्षा, रोजगार और सामाजिक क्षेत्र में उचित अवसर एवं हिस्सेदारी देने की मांग की।
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