सतीश सिंहलखनऊ , दिसम्बर 31 -- वर्ष 2025 में समाजवादी पार्टी (सपा) के लिए न तो सफलता का वर्ष रहा और न ही असफलता का। यह साल पार्टी के लिए आत्मविश्लेषण, संगठनात्मक पुनर्गठन और 2027 की रणनीतिक तैयारी का कालखंड बनकर सामने आया। सत्ता से बाहर रहते हुए सपा ने जहां एक ओर भाजपा सरकार पर आक्रामक विपक्ष की भूमिका निभाई, वहीं दूसरी ओर अपनी आंतरिक कमजोरियों और सामाजिक आधार को लेकर भी मंथन किया।

2025 में समाजवादी पार्टी ने प्रदेश की भाजपा सरकार को बेरोजगारी, महंगाई, किसान संकट, कानून-व्यवस्था, निजीकरण और आरक्षण जैसे मुद्दों पर लगातार घेरा। विधानसभा के भीतर और बाहर पार्टी नेताओं ने सरकार पर आरोप लगाया कि "विकास के दावे कागज़ों तक सीमित हैं, जबकि जमीनी हकीकत में आम जनता परेशान है।" खासतौर पर किसान भुगतान, फसल खरीद, स्वास्थ्य सेवाओं में अव्यवस्था और शिक्षा में निजीकरण को सपा ने प्रमुख राजनीतिक हथियार बनाया।

हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा के मुद्दे प्रासंगिक थे, लेकिन उन्हें जनांदोलन का व्यापक रूप देने में पार्टी पूरी तरह सफल नहीं हो सकी। जैसे एसआईआर, खाद, जैसे मुद्दों पर सिर्फ बयानबाजी तक पार्टी सीमित रही। सड़क पर उतर कर पार्टी ने कोई संघर्ष नही किया। बिहार चुनाव में प्रचार के बावजूद आरजेडी के पक्ष में प्रचार के बावजूद पार्टी कोई छाप नही छोड़ सकी।

2025 में अखिलेश यादव सपा की राजनीति के केंद्र में रहे। उन्होंने भाजपा सरकार पर तीखे हमलों के साथ-साथ संगठन को सक्रिय बनाए रखने के लिए लगातार बैठकें, दौरे और संवाद कार्यक्रम किए। अखिलेश यादव ने 'पीडीए' (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) की राजनीति को और मजबूत करने की कोशिश की। उनका फोकस साफ था, सामाजिक न्याय, आरक्षण की सुरक्षा और संविधान की रक्षा।

सपा का तर्क रहा कि भाजपा सरकार निजीकरण और संविदा व्यवस्था के जरिए आरक्षण व्यवस्था को कमजोर कर रही है। इसी मुद्दे को सपा ने अपने राजनीतिक नैरेटिव का केंद्र बनाया। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी रही कि अखिलेश यादव ने 2025 में अपनी छवि को केवल एक आक्रामक नेता तक सीमित न रखकर, एक वैकल्पिक मुख्यमंत्री के रूप में पेश करने का प्रयास किया। 2025 में सपा ने बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने जिला व मंडल स्तरीय समीक्षा बैठकें करने, युवाओं और पुराने कार्यकर्ताओं को फिर से जोड़ने जैसे कदम उठाए।

हालांकि 2025 में कोई विधानसभा चुनाव नहीं था, लेकिन सपा की नजर 2026 के पंचायत चुनाव और 2027 के विधानसभा चुनाव पर रही। पार्टी ने संकेत दिए कि टिकट वितरण, स्थानीय नेतृत्व और सामाजिक संतुलन को लेकर पहले से रणनीति बनाई जाएगी। यह भी साफ हुआ कि सपा अब केवल जातीय गणित नहीं, बल्कि स्थानीय मुद्दों और प्रदर्शन आधारित राजनीति पर भी जोर देना चाहती है।

वहीं मुस्लिम वोट का बड़ा हिस्सा अभी भी सपा के साथ माना जाता है, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि मुस्लिम समाज अब विकल्पहीनता की राजनीति से बाहर निकलकर प्रभावी विपक्ष और जीतने की क्षमता को महत्व दे रहा है। यदि सपा कमजोर दिखती है, तो मुस्लिम वोट का एक हिस्सा रणनीतिक मतदान की ओर झुक सकता है, यह संकेत सपा के लिए चेतावनी भी है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, पीडीए की अवधारणा ने पार्टी को सैद्धांतिक स्पष्टता दी, लेकिन इसे पूरी तरह चुनावी गणित में बदलना अब भी चुनौती बना हुआ है।

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