दरभंगा , अगस्त 01 -- िहार के प्रतिष्ठित ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग एवं प्रेमचन्द जयंती समारोह समिति, दरभंगा के संयुक्त तत्वावधान में शनिवार को प्रेमचन्द जयंती समारोह का आयोजन किया गया। विभागाध्यक्ष प्रो. उमेश कुमार की अध्यक्षता में आयोजित समारोह में ''प्रेमचन्द के कथा-साहित्य में ग्रामीण संस्कृति'' विषय पर परिचर्चा हुई।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. उमेश कुमार ने कहा कि प्रेमचन्द ग्रामीण संस्कृति के संवाहक रहे हैं। उनके कथा-साहित्य में ग्रामीण संस्कृति से प्रभावित पात्रों की जीवन-शैली, सामाजिक संरचना और संघर्ष का जीवंत चित्रण मिलता है। ग्रामीण संस्कृति की दृष्टि से 'पंच परमेश्वर', 'ईदगाह', 'पूस की रात', 'दो बैलों की कथा' और 'कफन' जैसी कहानियां महत्वपूर्ण हैं। 'गोदान', 'प्रेमाश्रम' और 'रंगभूमि' जैसे उपन्यासों में भी ग्रामीण जीवन और उसकी जटिलताओं को प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया गया है।
मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार एवं गीतकार हीरालाल सहनी ने प्रेमचन्द की साहित्य-साधना पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रेमचन्द ने साहित्य को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे समाज की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करने और जनचेतना जगाने का सशक्त माध्यम बनाया। उन्होंने किसानों, मजदूरों, गरीबों और वंचित वर्गों के जीवन-संघर्ष को अपनी रचनाओं का केंद्र बनाया। उनकी रचनाओं में तत्कालीन ग्रामीण भारत की आर्थिक विषमता, सामाजिक रूढ़ियों, शोषण और मानवीय संवेदनाओं का जीवंत चित्रण मिलता है। उन्होंने कहा कि प्रेमचन्द की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने अपने पात्रों के जीवन के भीतर उतरकर उनकी पीड़ा, संघर्ष और आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति दी। यही कारण है कि एक सदी से अधिक समय बाद भी उनका साहित्य प्रासंगिक बना हुआ है। उन्होंने अपनी स्वरचित कविताओं के माध्यम से भी प्रेमचन्द के कथा-लेखन और साहित्यिक संकल्प को रेखांकित किया।
प्रो. विजय कुमार ने कहा कि प्रेमचन्द की अनेक कहानियों और उपन्यासों में ग्रामीण संस्कृति के विविध रूपों के दर्शन होते हैं। उनकी रचनाओं में सामाजिक संरचना और संस्कृति का गहरा संबंध दिखाई देता है।
डॉ. महेश प्रसाद ने ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े प्रेमचन्द के व्यक्तित्व और उनकी रचनाधर्मिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनकी अनेक कृतियों में ग्रामीण संस्कृति और किसान जीवन का संघर्ष प्रमुखता से उभरता है। उनकी रचनाओं में सामाजिक सरोकार के साथ राष्ट्रीय चेतना की प्रवृत्ति भी स्पष्ट दिखाई देती है।
डॉ. मंजरी खरे ने कहा कि प्रेमचन्द के कथा-साहित्य का संसार अत्यंत व्यापक है। ग्रामीण जीवन की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के विभिन्न रूप उनकी रचनाओं में देखे जा सकते हैं।
बिंदु चौहान ने कहा कि प्रेमचन्द की लेखन-पद्धति ग्रामीण वातावरण और जनजीवन से गहराई से जुड़ी हुई थी। कृषक जीवन की पारंपरिक परिस्थितियों और उसके संघर्ष का सच्चा चित्र उनकी रचनाओं में मिलता है।
रंगकर्मी डॉ. श्याम भास्कर ने प्रेमचन्द के कृतित्व में उनके व्यक्तित्व को तलाशने का प्रयास करते हुए उनकी कहानियों में वर्णित ग्रामीण रीति-रिवाजों और सामाजिक जीवन का विस्तृत उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि प्रेमचन्द का साहित्य भारतीय ग्रामीण समाज की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करता है।
इस अवसर पर सुभद्रा कुमारी, कंचन रजक, मानसी और मुजाहिद ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए प्रेमचन्द के कथा-साहित्य में व्याप्त ग्रामीण संस्कृति के विभिन्न तत्वों और तथ्यों पर प्रकाश डाला।
समारोह के दूसरे सत्र में छात्रों के बीच प्रेमचन्द के साहित्य से संबंधित क्विज प्रतियोगिता आयोजित की गयी, जिसका संचालन डॉ. मंजरी खरे और बिंदु चौहान ने किया। धन्यवाद ज्ञापन महेश प्रसाद सिन्हा ने किया।
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