मिर्जापुर , जुलाई 30 -- गुरु पूर्णिमा के अवसर पर मिर्जापुर की प्राचीन लोक संस्कृति कजरी से जुड़े विभिन्न अखाड़ों में भी विधि-विधान से गुरु पूजन किया गया। इसके साथ ही आगामी कजरी दंगलों की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं।

मिर्जापुर की सदियों पुरानी कजरी परंपरा में गुरु-शिष्य संबंध का विशेष महत्व है। कजरी लेखक को गुरु और गायक को शिष्य का दर्जा प्राप्त होता है। कजरी गायक अपने गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा व्यक्त करते हुए प्रत्येक प्रस्तुति के अंत में गुरु का नाम लेकर अपने अखाड़े की परंपरा और महिमा का उल्लेख करता है।

लोक मान्यता के अनुसार आषाढ़ पूर्णिमा पर गुरु पूजन के बाद ही कजरी गायन का विधिवत शुभारंभ होता है। जिले के कजरी गायक किसी न किसी अखाड़े से जुड़े होते हैं और गुरु पूर्णिमा से कजरी दंगलों का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है। कजरी अखाड़ों का इतिहास भी इस लोकगायन परंपरा जितना ही प्राचीन माना जाता है। इन अखाड़ों में गुरु-शिष्य परंपरा के साथ स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी देखने को मिलती है। कजरी लेखक अपने द्वारा रचित कजरियों को एक रजिस्टर में सुरक्षित रखते हैं, जिसे सार्वजनिक नहीं किया जाता और न ही पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जाता है। इन्हें केवल संबंधित अखाड़े के गायक ही दंगलों में प्रस्तुत करते हैं।

पारंपरिक रूप से कजरी की विषयवस्तु दार्शनिक, धार्मिक और ऐतिहासिक रही है। पुराणों तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों के संदर्भों के आधार पर कजरियों की रचना की जाती रही है। हालांकि आधुनिक समय में समसामयिक विषयों पर भी कजरियां लिखी और गाई जा रही हैं।

कजरी दंगलों में दो अखाड़ों के गायक पूरे साज-सामान के साथ आमने-सामने बैठकर प्रश्नोत्तर शैली में गायन करते हैं। टॉस के बाद गायन प्रारंभ होता है और श्रोताओं की प्रतिक्रिया ही हार-जीत का आधार बनती है। यदि कोई अखाड़ा प्रतिपक्ष के प्रश्न का उत्तर कजरी के माध्यम से नहीं दे पाता तो उसे पराजित माना जाता है। कई बार पूरी रात चलने वाले दंगल का फैसला कुछ घंटों में ही हो जाता है।

बदलते समय के साथ अब महिला कलाकार भी कजरी दंगलों में भाग लेने लगी हैं। महिला और पुरुष कलाकारों के बीच होने वाले दंगल दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बन रहे हैं। समय के साथ जिले में कजरी अखाड़ों की संख्या में कमी आई है, लेकिन इसके बावजूद जाहगीर अखाड़ा, बफ्फत अखाड़ा, बैरागी अखाड़ा तथा शिवदास मालवीय अखाड़ा आज भी अपनी विशिष्ट पहचान और लोकप्रियता बनाए हुए हैं तथा मिर्जापुर की समृद्ध लोक सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

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