बैतूल , जुलाई 6 -- आधुनिक रसोई में मिक्सी और फूड प्रोसेसर के बढ़ते उपयोग के बीच पारंपरिक सिलबट्टा बनाने वाले कारीगरों के सामने आजीविका का संकट गहराता जा रहा है। मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के खेड़ी सावलीगढ़ गांव में आज भी 15 से 20 परिवार इस पुश्तैनी शिल्प को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन घटती मांग और बढ़ती लागत के कारण उनकी आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर हो रही है।
गांव के कारीगर सुबह से शाम तक छेनी और हथौड़ी की मदद से पत्थरों को तराशकर सिलबट्टा, चकला, लोढ़ी और खलबत्ता तैयार करते हैं। घंटों की मेहनत से तैयार होने वाला सिलबट्टा बाजार में केवल 200 से 250 रुपये में बिकता है, जिससे परिवार का गुजारा करना कठिन हो गया है।
स्थानीय कारीगर गुलाब धुर्वे ने बताया कि एक सिलबट्टा तैयार करने में लगभग दो दिन का समय लगता है। इसके लिए पहले जंगलों और पहाड़ियों से मजबूत काले पत्थरों का चयन किया जाता है। इसके बाद उन्हें गांव लाकर छेनी और हथौड़ी से तराशा जाता है तथा सतह को समतल और उपयोग योग्य बनाया जाता है। उन्होंने कहा कि इतनी मेहनत के बावजूद उत्पाद का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।
कारीगरों के अनुसार, पहले गांव-गांव में सिलबट्टों की अच्छी मांग रहती थी और मसाले तथा चटनी बनाने के लिए लगभग हर घर में इनका उपयोग होता था। अब मिक्सी और फूड प्रोसेसर ने उनकी जगह ले ली है। शहरों में मांग लगभग समाप्त हो चुकी है और ग्रामीण क्षेत्रों में भी बिक्री लगातार घट रही है। कई बार ग्राहक नकद राशि के बजाय गेहूं, मक्का या अन्य अनाज देकर सिलबट्टा खरीदते हैं, जिससे नकदी का संकट बना रहता है।
कारीगरों का कहना है कि पत्थर लाने, उन्हें तराशने और बाजार तक पहुंचाने की लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि बिक्री घटने से आय कम हो गई है। इसके कारण कई युवा इस पुश्तैनी व्यवसाय को छोड़कर मजदूरी अथवा अन्य रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
उन्होंने मांग की कि सरकार आधुनिक इलेक्ट्रिक कटिंग और आकार देने के उपकरण उपलब्ध कराए तथा प्रशिक्षण और विपणन की व्यवस्था करे। इससे कम समय में बेहतर गुणवत्ता के उत्पाद तैयार किए जा सकेंगे, आय बढ़ेगी और यह पारंपरिक शिल्प नई पीढ़ी तक पहुंच सकेगा।
ग्रामीणों का कहना है कि सिलबट्टा केवल घरेलू उपयोग की वस्तु नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा और लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि समय रहते इस शिल्प को संरक्षण नहीं मिला तो आने वाले वर्षों में सिलबट्टा बनाने की यह विरासत इतिहास और संग्रहालयों तक ही सीमित होकर रह जाएगी।
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