नयी दिल्ली , जुलाई 15 -- मिठाइयों, इत्र, पारंपरिक औषधियों और मंदिरों में उपयोग होने वाला सुगंधित केवड़ा का पौधा मानव सभ्यता और हिमालय के निर्माण से भी पुराना है और असम में मिले करीब 2.4 करोड़ वर्ष पुराने जीवाश्मों ने इसकी पुष्टि की है।

आधिकारिक सूचना के अनुसार विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (बीएसआईपी) लखनऊ के वैज्ञानिकों ने असम के माकुम कोयला क्षेत्र की टिकाक पर्वत संरचना से प्राप्त चार संरक्षित जीवाश्म पत्तियों का अध्ययन कर पाया गया है कि ये आधुनिक केवड़ा की पत्तियों से लगभग पूरी तरह मेल खाती हैं। अध्ययन में तलवार जैसी लंबी पत्तियां, समानांतर शिराएं और किनारों पर मौजूद विशिष्ट कांटेदार संरचना जैसी विशेषताएं भी सुरक्षित मिलीं, जो आज भी केवड़ा के पौधों में देखी जाती हैं।

वैज्ञानिक हर्षिता भाटिया और गौरव श्रीवास्तव के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन में आधुनिक केवड़ा प्रजातियों, हर्बेरियम अभिलेखों और दुनिया भर में उपलब्ध जीवाश्म रिकॉर्ड से तुलना के बाद पुष्टि की गई है कि ये जीवाश्म पैंडेनेसी कुल के हैं। इससे स्पष्ट होता है कि केवड़ा का यह वनस्पति वंश पृथ्वी पर मानव के अस्तित्व में आने से करोड़ों वर्ष पहले ही भारतीय उपमहाद्वीप में स्थापित हो चुका था।

अध्ययन के अनुसार, ये पौधे 8.5 करोड़ से 6.6 करोड़ वर्ष पहले यूरोप और उत्तरी अमेरिका तक फैले हुए थे। लगभग 3.4 करोड़ वर्ष पहले वैश्विक जलवायु में ठंड बढ़ने के बाद यह पौधा अधिकांश क्षेत्रों से विलुप्त हो गया और केवल ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्रों तक सीमित रह गया। असम में मिले जीवाश्म इस बात के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं कि भारत इस प्राचीन वनस्पति वंश का सुरक्षित आश्रय बना रहा, जहां यह लाखों वर्षों तक जीवित रह सका।

'जियोबायोस' पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार यह खोज केवड़ा के विकासक्रम की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इससे यूरोप और उत्तरी अमेरिका के पुराने जीवाश्म अभिलेखों तथा एशिया और ऑस्ट्रेलिया के अपेक्षाकृत नए अभिलेखों के बीच विकासवादी संबंध भी स्थापित होता है। अध्ययन यह भी दर्शाता है कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन के दौर में भारत प्राचीन उष्णकटिबंधीय वनस्पतियों के संरक्षण का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह शोध ऊष्णकटिबंधीय पौधों के विकास, भारतीय जैव विविधता के इतिहास और जलवायु परिवर्तन के दौरान पौधों के अनुकूलन को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देगा। इसके साथ ही भविष्य में बदलती जलवायु के बीच पारिस्थितिक तंत्रों की संभावित प्रतिक्रिया का आकलन करने में भी यह अध्ययन उपयोगी सिद्ध होगा।

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