(भारत भुषण से)नयी दिल्ली , अप्रैल 26 -- कई दशकों तक भारतीय राजनीति, इसके प्रमुख व्यक्तित्वों, प्रमुख घटनाओं को अपने कैमरे में कैद कर देश के समकालीन राजनीतिक इतिहास को एक जीवंत आयाम देने वाले महान फोटोग्राफर रघु राय का रविवार को निधन हो गया।
अपने समय के सच को पूरी निडरता और सच्चाई के साथ दिखाने वाले इस फोटोग्राफर ने 23 की उम्र में पहली बार कैमरे पर हाथ आजमाया था, तब से लेकर पूरी जिंदगी कैमरा उनके साथ ऐसे रहा, जैसे वह उनके शरीर का कोई अनिवार्य अंग हो। उनकी खिंची हुई तस्वीरें देखकर अनायास ही यह महसूस हो जाता है कि अपने 'व्यू फाइंडर' से तात्कालिक सच को देख पाने की उनमें अद्भुत क्षमता थी। 'व्यू फाइंडर' उनकी आत्मा का ही विस्तार था, जिसके द्वारा वह अनदेखे को देखकर कैमरे में कैद कर लेते और उसे अमर जीवंत तस्वीर में बदल देते थे।
अब इसे इत्तेफाक कहें या नियति का खेल की उनका जन्म महात्मा गांधी द्वारा भारत छोड़ो आंदोलन के बिगुल फूंके जाने के मात्र चार महीने बाद 18 दिसंबर 1942 को पंजाब के झंग में हुआ। यहीं वह समय था, जब भारत का इतिहास एक नये अध्याय में प्रवेश करने वाला था और बाद में युवा रघु राय इस नये अध्याय को अपने कैमरे से कैद करने वाले थे।
वह 1966 में प्रसिद्ध अंग्रेजी अखबार स्टेट्समैन में मुख्य फोटोग्राफर के रूप में शामिल हुए, और मात्र एक साल बाद इंदिरा गांधी देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनी। यह एक ऐसा संयोग था, जिसने हम भारतीयों को इंदिरा गांधी की कई अमूल्य तस्वीरें दीं।
श्री राय द्वारा श्रीमती गांधी की खिंची गई ये तस्वीरें इतनी जीवंत और प्रभावी हैं कि केवल इन तस्वीरों के आधार पर श्रीमती गांधी की राजनीतिक करियर का इतिहास गढ़ा जा सकता है। और यह तस्वीर केवल तथ्यों और आंकड़ों का इतिहास नहीं होगा। मानवीय पक्ष का इतिहास होगा।
मंच पर खोई हुई सिमटी सी बैठी इंदिरा गांधी की तस्वीर एक ऐसे विरोधाभास को दर्शाता है, जिसमें 'आयरन लेडी' चिंताओं और अव्यक्त भय से घिरी हुई एक साधारण महिला नजर आती हैं- बेहद मानवीय, सुभेद्य। एक तरफ अपनी कुर्सी पर बैठी और चारों तरफ से पुरुष नेताओं से घिरी हुई इंदिरा गांधी पुरुष वर्चस्व वाली राजनीति को चुनौती देती नजर आती हैं, तो दूसरी तरफ अपने घर में सोनिया गांधी और बच्चों के साथ मुस्कराती हुई बेहद पारिवारिक महिला दिखती हैं। रघु राय की तस्वीरें जितनी जीवंतता से इंदिरा गांधी के भावों को कैद और अभिव्यक्त करती हैं, उतनी जीवंतता से कोई भी इतिहासकार इंदिरा के बारे में नहीं लिख पाएगा। इसलिए रघु राय महज एक फोटोग्राफर नहीं है, एक इतिहासकार हैं, जो इतिहास को तथ्यों से परे ले जाकर मानवीय बना देता है।
इतिहास को मानवीय पक्ष देने वाले इस महान फोटोग्राफर की एक अन्य तस्वीर ने पूरी त्रासदी को एक जीवंत प्रतीक में बदल दिया। भोपाल त्रासदी की वह तस्वीर जिसमें एक बच्चा मलबे के नीचे दबा हुआ है, सिर्फ उसका शुष्क चेहरा और अध-खुली आँखें दिख रही हैं, आज भी उस भयावह त्रासदी को जैसे अपनी पुरी नग्नता के साथ आँखों के सामने लाकर खड़ा कर देता है।
संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान लोकनायक जयप्रकाश नारायण पर लाठी चार्ज की तस्वीर हो या बंगलादेश मुक्ति संग्राम के समय लोगों के पलायन की तस्वीर, श्री राय अपने समय के इतिहास की लगभग हर महत्वपूर्ण घटना को दर्ज करते चलते हैं। भिंडरावाले की मृत्यु से मात्र एक दिन पहले की उनकी पोट्रेट हो या मदर टेरेसा की मरीजों की सेवा करती हुई तस्वीर, वह मानवीय भावनाओं, डर और संवेदनाओं को पकड़ लेने में जैसे माहिर थे। इस लिहाज से वह एक मनोवैज्ञानिक लगते हैं, जो हाथ में कैमरा लिए अपने समय के लोगों की मनोदशाओं को कैद करता चलता है और मानवता का संवेदनशील दस्तावेज तैयार करता दिखता है।
श्री राय के इन्हीं विशिष्ट और अद्भुत कार्यों के लिए भारत सरकार ने 1972 में उन्हें पद्म श्री से नवाजा। लेकिन उनकी ख्याति केवल देश तक ही सीमित नहीं थी। उनके फोटो निबंध 'द न्यू यॉर्कर', 'द न्यूयॉर्क टाइम्स', 'टाइम', 'लाइफ', 'द इंडिपेंडेंट' और कई अन्य प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों में समय-समय पर छपते रहे।
श्री राय को 'नेशनल ज्योग्राफिक' में प्रकाशित उनके फोटो निबंध 'ह्यूमन मैनेजमेंट ऑफ वाइल्डलाइफ इन इंडिया' के लिए अमेरिका में 'फोटोग्राफर ऑफ द ईयर' पुरस्कार से सम्मानित किया गया। फ्रांसीसी सरकार ने भी उन्हें 2009 में 'ऑफिसर डेस आर्ट्स एट डेस लेट्रेस' से सम्मानित किया।
देश-विदेश में ख्याति प्राप्त यह महान फोटोग्राफर भले ही आज इस दुनिया से चला गया हो, लेकिन उनका काम, उनकी आयताकार तस्वीरें दुनिया में हमेशा जीवित रहेंगी और अपनी पुरी प्रामाणिकता एवं सच्चाई के साथ कहती रहेगी- एक था रघु राय, जिसने कैमरे से इतिहास लिख दिया, मानवीय संवेदना का इतिहास।
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