जयपुर , जुलाई 02 -- केन्द्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री और प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने एक ऐसे गवर्नेंस मॉडल का आह्वान किया है जहां प्रौद्योगिकी मानवीय बुद्धिमत्ता, नैतिकता और जवाबदेही द्वारा निर्देशित हो।
डॉ सिंह गुरुवार को जयपुर में आयोजित 29वें राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस सम्मेलन (एनसीईजी) के पुरस्कार सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) अब विकल्प का विषय नहीं रह गया है, बल्कि गवर्नेंस का एक अनिवार्य घटक बन गया है। उन्होंने कहा कि असली चुनौती एआई स्वयं नहीं है, बल्कि यह है कि क्या सरकारों के पास नागरिकों को हर प्रौद्योगिकी संबंधी हस्तक्षेप के केंद्र में रखते हुए, इसे जिम्मेदारी से लागू करने की दूरदर्शिता और परिपक्वता है।
उन्होंने कहा कि भारत का डिजिटल परिवर्तन मानव निर्णय लेने की प्रक्रिया को मशीनों से बदलने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि सार्वजनिक संस्थानों को ऐसी प्रौद्योगिकियों से सशक्त बनाने की प्रतिबद्धता से प्रेरित है जो पारदर्शिता, जवाबदेही, दक्षता और सेवा वितरण में सुधार लाती हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य के शासन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की गति और विश्लेषणात्मक क्षमताओं को मानवीय विवेक, संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक जवाबदेही के साथ जोड़ना होगा, यह सुनिश्चित करते हुए कि प्रौद्योगिकी सार्वजनिक संस्थानों या सिविल सेवकों की भूमिका को कम किए बिना शासन को मजबूत करे।
राष्ट्रीय सम्मेलन की मेजबानी के लिए राजस्थान सरकार को बधाई देते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की उत्साहपूर्ण भागीदारी प्रौद्योगिकी-आधारित लोक प्रशासन में सरकारों के बढ़ते विश्वास को दर्शाती है। उन्होंने राज्य सरकार द्वारा दिए गए पूर्ण सहयोग की सराहना की और कहा कि यह सम्मेलन "संपूर्ण सरकार" के दृष्टिकोण का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहां केंद्र, राज्य, शिक्षाविद, उद्योग और नागरिक समाज मिलकर भविष्य के शासन सुधारों को आकार देने में योगदान देते हैं। उन्होंने कहा कि तेजी से बदलती प्रौद्योगिकी और सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप शासन प्रणाली के निर्माण के लिए ऐसे सहयोगात्मक मंच आवश्यक हो गए हैं।
ई-गवर्नेंस पर राष्ट्रीय सम्मेलन के विकास को याद करते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि सरकार ने जानबूझकर प्रमुख गवर्नेंस सम्मेलनों को नई दिल्ली से बाहर आयोजित करने का निर्णय लिया है, ताकि सुधार पहल वास्तव में राष्ट्रीय स्वरूप की हो सकें। उन्होंने कहा कि विभिन्न क्षेत्रों में इन सम्मेलनों के आयोजन से भागीदारी बढ़ी है, राज्यों में स्वामित्व की भावना मजबूत हुई है और सरकारों को एक-दूसरे के अनुभवों से सीधे सीखने का अवसर मिला है। उन्होंने आगे कहा कि इसी तरह की पहल को बाद में कई अन्य मंत्रालयों और वैज्ञानिक संस्थानों में भी अपनाया गया है, जिससे सरकार, हितधारकों और नागरिकों के बीच मजबूत जुड़ाव बना है और नवाचार के राष्ट्रीय इकोसिस्टम का विस्तार हुआ है।
सम्मेलन के विषय का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकसित भारत 2047 के विजन से मेल खाता है, जहां प्रौद्योगिकी समावेशी विकास और सुशासन के साधन के रूप में कार्य करती है। उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में सरकार के शासन सुधार लगातार "अधिकतम शासन, न्यूनतम सरकार" के सिद्धांत द्वारा निर्देशित रहे हैं, जिसमें डिजिटल प्रौद्योगिकियों ने अधिक पारदर्शिता, त्वरित सेवा वितरण और बढ़ी हुई सार्वजनिक जवाबदेही को सक्षम बनाया है। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा-संचालित प्रशासन और सुरक्षित डिजिटल प्लेटफॉर्म अब नागरिकों की आकांक्षाओं के प्रति संवेदनशील शासन प्रणाली बनाने के अभिन्न अंग हैं।
उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को मानवीय उत्तरदायित्व के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि शासन को सशक्त बनाने वाले साधन के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, "असली सवाल सिर्फ कृत्रिम बुद्धिमत्ता का नहीं है; सवाल यह है कि हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करने में कितने बुद्धिमान हैं।" उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत को एक ऐसा गवर्नेंस मॉडल विकसित करना होगा, जहां मानव-नेतृत्व वाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता लोक प्रशासन के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत बने। उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी को मानवीय क्षमताओं को बढ़ाना चाहिए, संस्थागत विश्वसनीयता को मजबूत करना चाहिए और नागरिकों के अनुभव को बेहतर बनाना चाहिए, साथ ही नैतिकता, पारदर्शिता और जनविश्वास पर दृढ़ता से आधारित रहना चाहिए।
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