जम्मू , सितंबर 19 -- जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने शनिवार को कहा कि माता लल्लेश्वरी की शिक्षाएं सामाजिक विभाजनों से परे थीं और इनमें सहिष्णुता, समानता तथा आंतरिक परिवर्तन के आदर्श समाहित थे।

श्री सिन्हा ने थलवाल स्थित माता भद्रकाली अस्थापन में माता लल्लेश्वरी सांस्कृतिक-सह-विरासत केंद्र की आधारशिला रखने के बाद लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि पूंजीगत बजट के तहत 4.5 करोड़ रुपये की लागत से स्वीकृत यह परियोजना योगिनी लल्लेश्वरी की कालजयी विरासत के संरक्षण और प्रचार-प्रसार की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।

उपराज्यपाल ने कहा कि जम्मू-कश्मीर प्राचीन काल से ही ऋषियों, संतों और सत्य के साधकों की भूमि रहा है। उपनिषदों के उच्चतम सत्यों से साम्य रखने वाले माता लल्लेश्वरी के पद आज भी पीढ़ियों को प्रेरित करते हैं। माता लल्लेश्वरी को समर्पित यह केंद्र भारत की सभ्यतागत चेतना को प्रतिबिंबित करेगा और सांस्कृतिक समरसता, आध्यात्मिक पर्यटन तथा अकादमिक शोध के केंद्र के रूप में कार्य करेगा।

उन्होंने कहा, "यह परियोजना हमें हमारी कालजयी सभ्यतागत चेतना की याद दिलाती है। आज हम अपने इतिहास के ऐसे महत्वपूर्ण पड़ाव पर खड़े हैं, जहां हमारे पूर्वजों का आशीर्वाद और उनकी कालजयी ज्ञान परंपरा एक आत्मविश्वासी, विकसित और आत्मनिर्भर जम्मू-कश्मीर की आकांक्षाओं के साथ जुड़ रही है।"उन्होंने कहा कि यह केंद्र माता लल्लेश्वरी के दर्शन का जीवंत भंडार होगा, जहां विद्वान, कलाकार और साधक उनके ज्ञान से जुड़ सकेंगे तथा आधुनिक माध्यमों के जरिए उनकी शिक्षाओं का वैश्विक स्तर पर प्रसार कर सकेंगे। यह केंद्र केवल एक भौतिक संरचना नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण की संस्थागत नींव के रूप में कार्य करेगा। यहां प्रदर्शनियां, अनुवाद से जुड़ी पहल और अभिलेखागार की सुविधाएं होंगी। साथ ही, कश्मीर शैव दर्शन के क्षेत्र में फेलोशिप को भी बढ़ावा दिया जाएगा।

श्री सिन्हा ने कहा कि यह केंद्र कला और रचनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से युवाओं को सशक्त बनाने, सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने और राष्ट्रीय एकीकरण को मजबूत करने में मदद करेगा। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक और विरासत केंद्र राष्ट्रीय आवश्यकता हैं। आर्थिक विकास के साथ-साथ किसी राष्ट्र के लिए अपनी सभ्यतागत स्मृति और नैतिक दिशा भी आवश्यक है।

उन्होंने कहा, "माता लल्लेश्वरी केंद्र समाज को उसकी जड़ों से जोड़ेगा, मानसिक शांति के लिए आध्यात्मिक संसाधन उपलब्ध करायेगा तथा साधकों, इतिहासकारों और पर्यटकों को आकर्षित कर जमीनी स्तर पर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देगा। यह पहल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उस दृष्टिकोण के अनुरूप है, जिसमें उन्होंने लगातार विरासत को विकास के साथ जोड़ने के महत्व पर जोर दिया है। यह केंद्र भारत की सांस्कृतिक आत्मा के स्मारक और राष्ट्रीय शक्ति के स्रोत के रूप में खड़ा होगा।"श्री सिन्हा ने कहा कि वह लगातार समाज को याद दिलाते रहे हैं कि बिना जड़ों का पेड़ आंधी का सामना नहीं कर सकता। इसी तरह, अपनी मूल दृष्टि, सांस्कृतिक विरासत और ऋषि-मुनियों के दर्शन से कट जाने वाला समाज अपना संतुलन, संवेदनशीलता और दिशा-बोध खो देता है। उन्होंने कहा, "आज की तेज रफ्तार जिंदगी में लोग अभूतपूर्व मानसिक तनाव, पहचान के संकट और अस्तित्वगत अकेलेपन की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। यह भी उतना ही सच है कि बाहरी और भौतिक सफलता अकेले भीतर के खालीपन को नहीं भर सकती। मेरा मानना है कि माता लल्लेश्वरी जैसे संतों की शिक्षाएं और उन्हें समर्पित सांस्कृतिक केंद्र इस खालीपन को भरने तथा आत्म-अनुशासन, मानसिक शांति और भावनात्मक मजबूती के लिए आध्यात्मिक संसाधन उपलब्ध कराने में मदद करेंगे।"उन्होंने कहा कि माता लल्लेश्वरी सांस्कृतिक एवं विरासत केंद्र आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने और आर्थिक पुनरोद्धार में योगदान देगा।

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