जालौन , मार्च 21 -- उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में मां दुर्गा को केवल आस्था और भक्ति का प्रतीक ही नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, संगठन और सकारात्मक परिवर्तन की प्रेरणा के रूप में भी देखा जाता है। डॉ. हरीमोहन पुरवार 'बुन्देलल' के अनुसार मां दुर्गा का अलौकिक स्वरूप आज के समय में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना प्राचीन काल में था।

मां दुर्गा के तीन प्रमुख स्वरूप महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती मानव जीवन के तीन आवश्यक आयामों का प्रतिनिधित्व करते हैं। महाकाली बुराइयों के संहार की शक्ति हैं, महालक्ष्मी संतुलन और समृद्धि की प्रतीक हैं, जबकि महासरस्वती ज्ञान और सृजन की अधिष्ठात्री हैं।

उन्होंने बताया कि यह त्रिविध स्वरूप समाज को यह संदेश देता है कि विकास के लिए केवल शक्ति ही नहीं, बल्कि ज्ञान और संतुलन भी आवश्यक है। गुरु द्वारा शिष्य के अज्ञान का नाश, अहंकार का नियंत्रण और ज्ञान का संचार-तीनों ही इन स्वरूपों के प्रतीक माने जा सकते हैं।

प्राचीन मान्यता के अनुसार जब असुरराज महिषासुर का अत्याचार बढ़ा, तब देवताओं की संयुक्त शक्तियों से मां दुर्गा का प्राकट्य हुआ। यह प्रसंग सामूहिक प्रयास और संगठन की शक्ति को दर्शाता है।

मां दुर्गा का अष्टभुजी स्वरूप भी गहरा सामाजिक संदेश देता है। उनके आठ हाथ आठों दिशाओं में कर्मशीलता और सजगता के प्रतीक हैं, जबकि हाथों में धारण किए गए आयुध जीवन के विभिन्न संघर्षों और कर्तव्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अभय मुद्रा करुणा और सुरक्षा का संदेश देती है, त्रिशूल विकारों के दमन का, धनुष-बाण दूरदर्शिता का, गदा साहस का और शंख चेतना के जागरण का प्रतीक माना गया है।

उनका सिंह वाहन भी यह दर्शाता है कि अहंकार और उग्रता जैसी प्रवृत्तियों को संयम और ममता से नियंत्रित किया जा सकता है।वक्ताओं के अनुसार वर्तमान समय में जब समाज विभिन्न चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब मां दुर्गा का यह स्वरूप एकता, सहयोग और सकारात्मक कर्म का संदेश देता है। यह समाज को संगठित होकर बुराइयों पर विजय पाने की प्रेरणा प्रदान करता है।

इस प्रकार मां दुर्गा का अष्टभुजी स्वरूप केवल धार्मिक आस्था तक सीमित न होकर सामाजिक सुधार और मानवता के मार्गदर्शन का भी प्रतीक है।

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