पटना , सितंबर 15 -- भी घर की चारदीवारी तक सीमित रहने वाली बिहार की महिलाएं अब गांव की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रही हैं। स्वयं सहायता समूह के जरिए संगठित हुई इन महिलाओं ने बचत और ऋण का उपयोग कर अपने लिए स्वरोजगार शुरू किया। किसी ने खेती और पशुपालन तो किसी ने सिलाई, भोजन निर्माण और छोटे कारोबार को आय का स्थायी जरिया बनाया है।
पिछले करीब दो दशकों में जीविका ने महिलाओं को संगठित कर इस बदलाव की मजबूत नींव तैयार की है।
वर्ष 2006 में शुरू हुई जीविका परियोजना आज राज्य के गांव-गांव तक पहुंच चुकी है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को बचत, बैंकिंग, ऋण और आजीविका से जोड़ा गया है। वर्तमान में बिहार में 11.88 लाख स्वयं सहायता समूह, 73,517 ग्राम संगठन और 1,684 संकुल स्तरीय संघ गठित हो चुके हैं। इन संस्थाओं ने महिलाओं को केवल आर्थिक सहयोग ही नहीं दिया, बल्कि उन्हें अपनी बात रखने और निर्णय लेने का मंच भी उपलब्ध कराया है।
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