मुंबई , सितंबर 25 -- महाराष्ट्र सरकार ने कॉलेज कैंपस और उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्र परिषद के चुनाव फिर से शुरू करने के तरीकों पर विचार करने के लिए आधिकारिक तौर पर 12 सदस्यों की एक समिति बनाने की घोषणा की है।
उच्च और तकनीकी शिक्षा विभाग ने मुंबई विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर सुहास पेडनेकर की अध्यक्षता में इस समिति के गठन के संबंध में एक सरकारी आदेश जारी किया है।
समिति को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए एक महीने का समय दिया गया है। इस रिपोर्ट के आधार पर महाराष्ट्र सरकार चुनाव प्रक्रिया आयोजित करने या न करने, या इसे कैसे आयोजित किया जाए, इस पर आगे का निर्णय लेगी। बारह सदस्यों वाली इस समिति में पूर्व कुलपति और कुलपति, प्रिंसिपल, एक वरिष्ठ कानून अधिकारी और विश्वविद्यालय के अधिकारी शामिल हैं। यह समिति शांतिपूर्ण, पारदर्शी और समावेशी कैंपस चुनाव के लिए उपाय सुझाने के उद्देश्य से विभिन्न हितधारकों के साथ परामर्श शुरू करेगी।
लगभग 33 साल पहले, 1990 के दशक की शुरुआत में महाराष्ट्र में छात्र चुनावों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। यह प्रतिबंध 1989 में मुंबई के एक कॉलेज के बाहर चुनाव प्रचार के दौरान भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ (एनएसयूआई) के छात्र नेता ओवेन डिसूजा की हत्या और कैंपस में हिंसा की कई घटनाओं के बाद लगाया गया था।
महाराष्ट्र विश्वविद्यालय अधिनियम, 1994 ने प्रत्यक्ष, प्रतिस्पर्धी छात्र चुनावों पर रोक लगा दी, जिससे उस व्यवस्था का अंत हो गया जिसके तहत छात्र कैंपस में अपने प्रतिनिधियों को चुन सकते थे।
फडणवीस सरकार द्वारा गठित 12 सदस्यों की इस समिति में बाहरी राजनीतिक हस्तक्षेप और छात्र परिषद चुनाव प्रक्रिया के व्यावसायीकरण को रोकने के उपाय भी शामिल होंगे। समिति छात्र परिषद के फंड के प्रबंधन और ऑडिट, चुने गए प्रतिनिधियों के अनुकूलन और प्रशिक्षण, साथ ही नामांकन दाखिल करने, जांच-पड़ताल और शिकायतों के निवारण के लिए डिजिटल प्रणाली के उपयोग की भी समीक्षा करेगी।
छात्र परिषद चुनावों को फिर से शुरू करने का पहला औपचारिक प्रयास 2016 में किया गया था, जब महाराष्ट्र सार्वजनिक विश्वविद्यालय अधिनियम में विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और विभागों में चुनी हुई छात्र परिषदों का प्रावधान किया गया था। वर्ष 2018 में विस्तृत नियम बनाये गये थे और विश्वविद्यालयों ने 2019 में चुनाव कराने की तैयारी शुरू कर दी थी, लेकिन महाराष्ट्र राज्य कैबिनेट ने कानून-व्यवस्था की चिंताओं और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के साथ समय के टकराव का हवाला देते हुए चुनावों को टाल दिया था , इसलिए ये चुनाव कभी नहीं हो पाये।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार हाल ही में 'जेन जी' के विरोध-प्रदर्शनों के बाद यह मुद्दा फिर से चर्चा में आया। इन प्रदर्शनों में पूरे महाराष्ट्र से युवाओं ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया था।
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