रायपुर , मार्च 06 -- छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति (एसटी) आरक्षण से जुड़ा एक अहम मामला सामने आया है। राज्य की उच्च स्तरीय प्रमाणीकरण छानबीन समिति ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) से जुड़े मुख्य अभियंता के.के. कटारे को छत्तीसगढ़ में एसटी आरक्षण का लाभ लेने के लिए अयोग्य करार दिया है।
समिति ने अपने आदेश में कहा है कि कटारे का मूल निवास महाराष्ट्र में होने के कारण वे छत्तीसगढ़ राज्य में अनुसूचित जनजाति वर्ग के संवैधानिक आरक्षण के पात्र नहीं हैं। इस संबंध में समिति ने 26 फरवरी 2026 को आदेश जारी किया है।मामला शिकायत के आधार पर समिति के समक्ष आया था। जानकारी के अनुसार शिकायतकर्ता विजय मिश्रा ने आरोप लगाया था कि के.के. कटारे दूसरे राज्य से संबंध रखने के बावजूद छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति वर्ग के आरक्षण का लाभ ले रहे हैं। इस विषय में जनपद पंचायत डोंगरगांव (जिला राजनांदगांव) के उपाध्यक्ष वीरेंद्र बोरकर द्वारा भी शिकायत दर्ज कराई गई थी।
इसके बाद आदिम जाति, अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक विकास विभाग तथा कृषि विकास एवं किसान कल्याण मंत्रालय से प्राप्त पत्राचार के आधार पर मामले की जांच शुरू की गई।
जांच के दौरान सामने आया कि कटारे के पिता वर्ष 1962 से 1993 तक अविभाजित मध्यप्रदेश में शासकीय सेवा में कार्यरत थे। वहीं उनके द्वारा प्रस्तुत पेंशन से संबंधित दस्तावेजों में ग्राम एवं पोस्ट तुमसर, जिला भंडारा (महाराष्ट्र) को स्थायी पता बताया गया है। समिति ने यह भी पाया कि कटारे ऐसा कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सके जिससे यह सिद्ध हो सके कि उनके पूर्वज 10 अगस्त 1950 से पहले मध्यप्रदेश या वर्तमान छत्तीसगढ़ क्षेत्र के मूल निवासी थे।
सुनवाई के दौरान के.के. कटारे ने स्वयं स्वीकार किया कि उनका मूल निवास महाराष्ट्र के भंडारा जिले के तुमसर में है। उन्होंने यह भी बताया कि पहले यह इलाका अविभाजित मध्यप्रदेश का हिस्सा था और उनके पिता वर्ष 1953 से बालाघाट में नौकरी के कारण रह रहे थे। इसी आधार पर वर्ष 1978 में तहसील वारासिवनी, जिला बालाघाट से उन्हें जाति प्रमाण पत्र जारी किया गया था। कटारे ने यह भी बताया कि उनके जाति संबंधी दस्तावेजों की जांच फिलहाल मध्यप्रदेश में भी लंबित है।
समिति ने अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सूची प्रत्येक राज्य के लिए अलग-अलग निर्धारित होती है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति एक राज्य की अनुसूचित जाति या जनजाति से संबंधित है और वह दूसरे राज्य में जाता है, तो उसे उस राज्य में आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता।
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