नागपुर , मई 27 -- जेलों में अप्राकृतिक मौतों के मामले में महाराष्ट्र देश में पांचवें स्थान पर रहा जिसका खुलासा केंद्र की सालाना 'भारत में जेलें' रिपोर्ट में हुआ है।

रिपोर्ट के अनुसार 2024 में ऐसी आठ मौतें दर्ज की गयीं। इस साल देश भर की 1,333 जेलों में कुल 1,960 कैदियों की मौत हुई, जिनमें से 166 मौतों को अप्राकृतिक श्रेणी में रखा गया। सबसे ज़्यादा 26 मौतें उत्तर प्रदेश में दर्ज की गईं, जिसके बाद हरियाणा (15), दिल्ली (12), राजस्थान (नौ) और महाराष्ट्र (आठ) का नंबर आता है। महाराष्ट्र में दर्ज आठ अप्राकृतिक मौतों में से छह आत्महत्याएं थीं, जबकि दो कैदियों की कथित तौर पर उनके साथी कैदियों ने हत्या कर दी थी। रिपोर्ट में बताया गया है कि 2024 में देश भर की जेलों में 5,11,542 कैदी बंद थे।

जेलों में कैदियों की संख्या में 3.5 प्रतिशत की कमी आई, फिर भी हिरासत में अप्राकृतिक मौतों की संख्या को लेकर चिंताएं बनी रहीं। कुल मौतों में से 1,737 को प्राकृतिक मौतें माना गया, जो कुल मौतों का 88.6 प्रतिशत है, जबकि 57 मौतों के कारणों का पता अभी तक नहीं चल पाया है। आत्महत्या एक बड़ी चिंता बनी रही, देश भर की जेलों में 122 कैदियों ने अपनी जान दे दी। इनमें से 110 मौतें फांसी लगाने से हुईं। जेलों में आत्महत्या के सबसे ज़्यादा 16 मामले उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए, जिसके बाद हरियाणा (15) और पंजाब (12) का नंबर आता है। सात कैदियों की मौत खुद को चोट पहुंचाने से हुई, जबकि दो कैदियों की मौत ज़हर खाने से हुई।

रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि पांच कैदियों की मौत ड्रग्स की ओवरडोज़ से हुई और पांच अन्य कैदियों की मौत दुर्घटनाओं में हुई। महाराष्ट्र में जेलों में 136 प्राकृतिक मौतें दर्ज की गईं, जिससे यह उत्तर प्रदेश (304) और पंजाब (213) के बाद देश में तीसरे स्थान पर रहा। देश भर में 1,656 प्राकृतिक मौतें बीमारियों के कारण हुईं, जबकि 81 कैदियों की मौत बुढ़ापे के कारण हुई। बीमारियों से होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण हृदय रोग रहा, जिसके 472 मामले सामने आए। इसके बाद फेफड़ों के रोग (195), कैंसर (117), लिवर की बीमारियां (97), टीबी (88), किडनी की बीमारी (73), ब्रेन हेमरेज (51) और एचआईवी से जुड़ी जटिलताएं (44) रहीं।

मानवाधिकार विशेषज्ञ और वकील निहाल राठौड़ ने कहा कि अदालतों को दोषियों को सज़ा सुनाने से पहले जेल अधिकारियों से 'फिटनेस प्रमाण पत्र' लेने पर विचार करना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे अनाथालयों, किशोर सुधार गृहों और वृद्धाश्रमों के लिए सालाना 'अनुपालन प्रमाण पत्र' ज़रूरी होते हैं।

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