धारवाड़ , अगस्त 10 -- कित्तूर की रानी चेन्नम्मा, संगोल्ली रायन्ना और कर्नाटक के स्वतंत्रता संग्राम के अन्य महानायकों के ऐतिहासिक दस्तावेज आंशिक रूप से महाराष्ट्र के अभिलेखागार में काफी दिनों से पड़े हैं। इनमें राज्य के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास से जुड़े दो लाख से अधिक दस्तावेज अभिलेखागारों और अनुसंधान संस्थानों में मौजूद हैं।
इतिहासकारों और शोधकर्ताओं ने अब कर्नाटक सरकार से इन दस्तावेजों को तुरंत वापस लाने, संरक्षित करने, डिजिटल बनाने और उनका अनुवाद कराने का आग्रह किया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि लगातार अनदेखी से यह बहुमूल्य ऐतिहासिक साक्ष्य हमेशा के लिए नष्ट हो सकते हैं। महाराष्ट्र राज्य अभिलेखागार तथा पुणे, कोल्हापुर और मुंबई के शोध पुस्तकालयों में रखे ये रिकॉर्ड मुख्य रूप से सदियों पुरानी मोडी लिपि में लिखे गये हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि ये दस्तावेज कर्नाटक के इतिहास के कई अनसुलझे अध्यायों पर महत्वपूर्ण रोशनी डाल सकते हैं।
माना जा रहा है कि कित्तूर की रानी चेन्नम्मा और संगोल्ली रायन्ना से संबंधित दस्तावेजों के अलावा, इस सामग्री में बेलावाड़ी मल्लम्मा, सिंदूर लक्ष्मणा और आमटूर बलप्पा से जुड़े दस्तावेज भी शामिल हैं। इतिहासकारों का कहना है कि उत्तरी कर्नाटक के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास को समझने तथा इसे भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए ये रिकॉर्ड बेहद जरूरी हैं।
ये दस्तावेज कित्तूर विद्रोह के बाद के घटनाक्रम, पेशवाओं और कन्नड़ शासकों के बीच संबंधों, उत्तरी कर्नाटक में ब्रिटिश कराधान (टैक्स) व्यवस्था, मैसूर रियासत और मराठा शासकों के रिश्तों तथा टीपू सुल्तान और वर्तमान महाराष्ट्र के क्षेत्रों के बीच संबंधों पर नयी जानकारी दे सकते हैं। कर्नाटक-महाराष्ट्र सीमा विवाद में भी इन रिकॉर्डों का बड़ा महत्व हो सकता है, क्योंकि क्षेत्रीय सीमांकन और प्रशासनिक सीमाओं से जुड़े ब्रिटिश काल के दस्तावेज अहम ऐतिहासिक साक्ष्य दे सकते हैं। इतिहासकारों ने बताया कि मोडी लिपि को पढ़ने की जटिलता और प्रशिक्षित विशेषज्ञों की कमी के कारण ज्यादातर सामग्री तक पहुंच संभव नहीं हो पायी है। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जतायी कि पिछले कुछ दशकों में कई दस्तावेज खराब हो चुके हैं।
कर्नाटक के इतिहासकारों के एक दल ने 2016 में अभिलेखागार की जांच के लिए महाराष्ट्र का दौरा किया था, लेकिन दस्तावेजों की भारी संख्या और मोडी लिपि को पढ़ने में आयी कठिनाइयों के कारण विस्तृत मूल्यांकन नहीं हो सका। मूल रिकॉर्ड तक पहुंच बनाने, विशेषज्ञों को प्रशिक्षित करने और सामग्री का कन्नड़ में अनुवाद करने के लिए सरकारी धन जुटाने का एक प्रस्ताव भी इसके बाद आगे नहीं बढ़ पाया। कन्नड़ विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष पुरुषोत्तम बिलिमाले ने कहा कि कर्नाटक की विरासत को सहेजने के लिए इन रिकॉर्डों को वापस लाना बेहद जरूरी है। उन्होंने बताया कि मराठी से कन्नड़ अनुवाद में माहिर विद्वान तो उपलब्ध हैं, लेकिन मोडी लिपि पढ़ने में सक्षम विशेषज्ञ बहुत कम हैं।
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