यवतमाल , अगस्त 04 -- महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में कृषि संकट लगातार गहराता जा रहा है। यवतमाल जिले में वर्ष 2026 के पहले छह महीनों के दौरान 152 किसानों ने आत्महत्या की है, जिससे किसानों के कल्याण के लिए सरकार द्वारा संचालित योजनाओं की प्रभावशीलता पर फिर सवाल उठने लगे हैं।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार रालेगांव, मारेगांव, दारव्हा, पुसद, महागांव और यवतमाल तहसीलों में सबसे अधिक किसान आत्महत्याएं हुई हैं। इन क्षेत्रों में कृषि मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर है।
अपर्याप्त सिंचाई सुविधाएं, कपास और सोयाबीन की खेती पर अत्यधिक निर्भरता तथा खेती की बढ़ती लागत ने किसानों की आर्थिक स्थिति को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
आंकड़ों के अनुसार आत्महत्या करने वाले अधिकांश किसानों की आयु 30 से 50 वर्ष के बीच थी। बढ़ते कर्ज, पारिवारिक जिम्मेदारियां, बच्चों की शिक्षा का खर्च और लगातार फसल खराब होने से कई किसान आर्थिक एवं मानसिक संकट में घिर गए। अधिकांश किसानों ने कथित रूप से कीटनाशक पीकर या फांसी लगाकर आत्महत्या की।
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 2024 में जिले में 300 से अधिक तथा 2025 में 342 किसानों ने आत्महत्या की थी। जनवरी से जून 2026 के बीच 152 और मामले सामने आने के साथ ही पिछले ढाई वर्षों में जिले में किसान आत्महत्याओं की संख्या 800 से अधिक हो गयी है।
सरकार आत्महत्या करने वाले किसानों के परिजनों को आर्थिक सहायता देती है, लेकिन प्रक्रियागत बाधाओं के कारण अनेक परिवार इसके पात्र नहीं बन पाते। निजी साहूकारों या गैर-राष्ट्रीयकृत संस्थानों से लिए गए ऋण, भूमि अभिलेखों की कमी अथवा उत्तराधिकार संबंधी दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने पर कई मामलों में सहायता नहीं मिलती। कुछ मामलों में पारिवारिक विवाद या गैर-कृषि कारणों को आधार बनाकर भी सहायता से वंचित कर दिया जाता है।
किसान स्वावलंबन मिशन के पूर्व अध्यक्ष किशोर तिवारी ने आरोप लगाया कि सरकार कृषि संकट के मूल कारणों की अनदेखी कर रही है।
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