देवरिया, जुलाई 29 -- उत्तर प्रदेश में देवरिया जिला मुख्यालय से करीब चालीस किलोमीटर दूर सलेमपुर तहसील के दीर्घेश्वरनाथ मंदिर अनादि काल से लोगों में आस्था का केंद्र होने के साथ इतिहास, पुराण और पुरातत्व को भी अपने आंचल में समेटे हुए है।
जनश्रुतियों अनुसार गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने इसी स्थान पर भगवान शिव की कठोर आराधना की थी। कहा जाता है कि यहीं से उन्हें अजेय शक्ति और चिरंजीव होने का वरदान मिला। लोक विश्वास है कि कलियुग में भी अश्वत्थामा जीवित हैं और समय-समय पर यहां आकर दीर्घेश्वरनाथ की पूजा करते हैं।
मंदिर से सटे सरोवर के किनारे कई बार ताजे फूल और बेलपत्र मिलना इस बात का प्रमाण माना जाता है। यहां के पुराने जानकार लोग बताते हैं कि ब्रह्म बेला में यहां घंटे की आवाज और शंखनाद सुनाई देता है। मान्यता के अनुसार महाभारत काल के प्रसिद्ध राजा जरासंध ने भी राज्य प्राप्ति के लिए यहीं शिवलिंग की स्थापना कर तपस्या की थी।
मंदिर के वर्तमान महंथ जगन्नाथ दास जी महाराज के अनुसार ऋग्वेद में दीर्घेश्वर नाम का उल्लेख मिलता है। उनका मानना है कि वैदिक काल में भी यह स्थान ऋषि-मुनियों की तपोभूमि रहा होगा।आज भी सावन, शिवरात्रि और सोमवार को यहां हजारों की भीड़ उमड़ती है। भक्तगण मानते हैं कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मन्नत अवश्य पूरी होती है। मंदिर परिसर में सरोवर, पीपल और बरगद के प्राचीन वृक्ष इसकी प्राचीनता की गवाही देते हैं।स्थानीय लोगों का कहना है कि मझौली के बिशेन राजाओं ने भी इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। इसीलिए इसे मझौली रियासत का कुलदेवता भी कहा जाता है।
यहां के लोगों का कहना है कि दीर्घेश्वरनाथ मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं है। यह वेद, पुराण, महाभारत और मध्यकालीन इतिहास को जोड़ने वाली जीवित कड़ी है। एक ओर जहां अश्वत्थामा की कथा इसे पौराणिक बनाती है, वहीं सेन-गुप्तकालीन मूर्तियां इसे पुरात्विक महत्व देती हैं। यहां के लोगों की मांग है कि सरकार और पुरातत्व विभाग को चाहिए कि इस स्थान का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराकर इसे पर्यटन और धार्मिक सर्किट से जोड़ा जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस अमर विरासत से परिचित हो सकें।
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