भुवनेश्वर , जून 01 -- प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओडिशा की प्रस्तावित यात्रा से पहले महानदी की सुरक्षा की मांग करने और नदी बेसिन में पानी की उपलब्धता संबंधी चिंताओं की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए भुवनेश्वर में एक मानव श्रृंखला का आयोजन किया जाएगा।
यह फैसला रविवार को 'महानदी बचाओ आंदोलन' के बैनर तले आयोजित महानदी जल विवाद पर आयोजित संगोष्ठी में लिया गया। पूर्व पुलिस महानिदेशक अमिया भूषण त्रिपाठी की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के छोड़कर राज्य के लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। बीजू जनता दल (बीजद), कांग्रेस, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) , फॉरवर्ड ब्लॉक, सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ इंडिया (एसयूसीआई) , भाकपा(एमएल), ओडिशा जनता कांग्रेस पार्टी, समता क्रांति और राष्ट्रीय जनता दल के नेताओं के साथ-साथ विशेषज्ञों, सेवानिवृत्त इंजीनियरों, पूर्व प्रशासकों और बुद्धिजीवियों ने भी इस चर्चा में हिस्सा लिया।
प्रतिभागियों ने महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण के समक्ष प्रस्तुत किए गए आंकड़ों की राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित इंजीनियरों और जल संसाधन विशेषज्ञों द्वारा स्वतंत्र जांच किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि छत्तीसगढ़ द्वारा नदी के प्राकृतिक प्रवाह पर कथित रोक ओडिशा की जल सुरक्षा के साथ-साथ महानदी बेसिन की पारिस्थितिक स्थिरता के लिए भी एक गंभीर खतरा पैदा कर सकती है। पूर्व सिंचाई मंत्री निरंजन पटनायक ने कहा कि ओडिशा सरकार को हीराकुंड बांध के नीचे महानदी के निचले इलाकों में जल संरक्षण के प्रयासों को तेज करना चाहिए। महानदी विवाद को सुलझाने के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित उच्च-स्तरीय समिति के सदस्य और बीजद विधायक निरंजन पुजारी ने कहा कि सरकार ने शुरू में बातचीत के जरिए इस मुद्दे को सुलझाने का प्रस्ताव रखा था। हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया कि इस दिशा में बहुत कम प्रगति हुई है और दावा किया कि समिति के सदस्यों को न्यायाधिकरण के समक्ष प्रस्तुत किए जा रहे आंकड़ों के बारे में सूचित नहीं रखा गया है।
वरिष्ठ पत्रकार रबी दास ने चेतावनी दी कि अगर समय पर सुधार के कदम नहीं उठाए गए, तो इसके गंभीर और लंबे समय तक चलने वाले नतीजे हो सकते हैं। उन्होंने आगाह किया कि भविष्य में ओडिशा के बड़े हिस्सों में रेगिस्तान जैसी स्थितियाँ पैदा हो सकती हैं। पूर्व वरिष्ठ प्रशासक संजीव होता और अरविंद बेहरा ने भी इस विवाद से जुड़े पानी के आँकड़ों की स्वतंत्र जाँच की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।
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