जालौन , जून 30 -- उत्तर प्रदेश के जालौन जिले की कालपी तहसील में बेतवा (वेत्रवती) नदी के बाएं तट पर स्थित परासन गांव भारतीय ऋषि परंपरा, वैदिक संस्कृति और पौराणिक इतिहास का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। इतिहासकारों का कहना है कि यह स्थान महर्षि पाराशर की तपोभूमि रहा है और भगवान वेदव्यास की गौरवशाली परंपरा से जुड़ा हुआ है।

वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. हरिमोहन पुरवार ने बताया कि परासन प्राचीन काल से तप, साधना और वैदिक अनुष्ठानों का केंद्र रहा है। मान्यता है कि महर्षि पाराशर ने यहां कठोर तपस्या और यज्ञ किए थे, जिसके कारण इस स्थान का नाम "परासन" पड़ा। उन्होंने बताया कि परासन और उसके आसपास का पंचकोसी क्षेत्र धार्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि इस क्षेत्र में महर्षि मार्कण्डेय, वाल्मीकि, च्यवन, कर्दम, वशिष्ठ और पाराशर सहित अनेक ऋषियों के आश्रम रहे हैं। आज भी श्रद्धालु पंचकोसी परिक्रमा कर धार्मिक आस्था प्रकट करते हैं।

डॉ. पुरवार के अनुसार परासन गांव रोपण गुरु आश्रम के दक्षिण में हरपालपुर-राठ-उरई मार्ग के निकट बेतवा नदी के किनारे स्थित है। च्यवन ऋषि की तपोस्थली माने जाने वाले चनौट के सामने स्थित यह स्थान महर्षि पाराशर की साधना भूमि के रूप में प्रसिद्ध है, जहां उन्होंने वैदिक अनुष्ठान और आध्यात्मिक साधना की।

उन्होंने बताया कि महर्षि पाराशर, महर्षि वशिष्ठ के पौत्र तथा शक्ति ऋषि के पुत्र थे और उन्हें महान गोत्रकार ऋषियों में गिना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महर्षि पाराशर और सत्यवती (मत्स्यगंधा) के पुत्र के रूप में भगवान वेदव्यास का जन्म यमुना के एक द्वीप पर हुआ था। द्वीप में जन्म लेने के कारण उनका नाम कृष्ण द्वैपायन पड़ा। बाद में उन्होंने वेदों का विभाजन किया तथा महाभारत और अनेक पुराणों की रचना कर भारतीय संस्कृति को अमूल्य धरोहर प्रदान की।

स्थानीय निवासी मनीष तिवारी ने बताया कि धार्मिक ग्रंथों के अनुसार महर्षि पाराशर का वंश महर्षि वशिष्ठ से जुड़ा है। वशिष्ठ के पुत्र शक्ति ऋषि थे और शक्ति के पुत्र महर्षि पाराशर हुए। इसी ऋषि परंपरा में भगवान वेदव्यास का अवतरण हुआ।

पौराणिक कथाओं के अनुसार तीर्थयात्रा के दौरान महर्षि पाराशर की भेंट यमुना तट पर सत्यवती से हुई। अपने तपोबल से उन्होंने सत्यवती को दिव्य सुगंध का वरदान दिया, जिसके बाद वह मत्स्यगंधा से योजनगंधा कहलाने लगीं। इसी संयोग से भगवान वेदव्यास का जन्म हुआ, जिन्हें भगवान विष्णु का अंशावतार भी माना जाता है।

डॉ. पुरवार ने बताया कि मत्स्य पुराण में महर्षि पाराशर की वंश परंपरा का भी विस्तृत उल्लेख मिलता है। इसमें गौर, नील, कृष्ण, श्वेत, श्याम और धूम्र पाराशर नामक छह प्रमुख शाखाओं का वर्णन है तथा सभी का प्रवर पाराशर, शक्ति और महर्षि वशिष्ठ बताए गए हैं।

इतिहासकारों का मानना है कि परासन केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि भारतीय ऋषि परंपरा और वैदिक संस्कृति की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर भी है। उनका कहना है कि यदि इस स्थल का वैज्ञानिक और पुरातात्विक अध्ययन कर प्रभावी संरक्षण किया जाए तो यह धार्मिक पर्यटन, सांस्कृतिक अध्ययन और इतिहास शोध का प्रमुख केंद्र बन सकता है। स्थानीय लोगों ने भी परासन की इस विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने और संरक्षित करने की मांग की है।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित