, Oct. 25 -- साहिर वर्ष 1950 में मुंबई आ गये। साहिर ने 1950 में प्रदर्शित 'आजादी की राह पर' फिल्म में अपना पहला गीत 'बदल रही है जिंदगी' लिखा लेकिन फिल्म सफल नहीं रही। वर्ष 1951 में एस.डी.बर्मन की धुन पर फिल्म 'नौजवान' में लिखे अपने गीत 'ठंडी हवाएं लहरा के आये' के बाद गीतकार के रूप में कुछ हद तक अपनी पहचान बनाने में सफल हो गये। साहिर ने खय्याम के संगीत निर्देशन में भी कई सुपरहिट गीत लिखे।वर्ष 1958 में प्रदर्शित फिल्म 'फिर सुबह होगी' के लिये पहले अभिनेता राजकपूर यह चाहते थे कि उनके पसंदीदा संगीतकार शंकर जयकिशन इसमें संगीत दें जबकि साहिर इस बात से खुश नहीं थे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि फिल्म में संगीत खय्याम का ही हो। 'वो सुबह कभी तो आयेगी' जैसे गीतों की कामयाबी से साहिर का निर्णय सही साबित हुआ। यह गाना आज भी क्लासिक गाने के रूप में याद किया जाता है।
साहिर अपनी शर्तों पर गीत लिखा करते थे। एक बार एक फिल्म निर्माता ने नौशाद के संगीत निर्देशन में उनसे गीत लिखने की पेशकश की। साहिर को जब इस बात का पता चला कि संगीतकार नौशाद को उनसे अधिक पारिश्रमिक दिया जा रहा है तो उन्होंने निर्माता को अनुबंध समाप्त करने को कहा।उनका कहना था कि नौशाद एक महान संगीतकार हैं लेकिन धुनों को शब्द ही वजनी बनाते हैं। अत: एक रुपया ही अधिक सही गीतकार को संगीतकार से अधिक पारिश्रमिक मिलना चाहिये।
गुरुदत्त की फिल्म 'प्यासा' साहिर के सिने करियर की अहम फिल्म साबित हुई। फिल्म के प्रदर्शन के दौरान अछ्वुत नजारा दिखाई दिया। मुंबई के मिनर्वा टॉकीज में जब यह फिल्म दिखाई जा रही थी तब जैसे ही 'जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां हैं' बजा तब सभी दर्शक अपनी सीट से उठकर खड़े हो गये और गाने की समाप्ति तक ताली बजाते रहे। बाद में दर्शकों की मांग पर इसे तीन बार और दिखाया गया।फिल्म इंडस्ट्री के इतिहास में शायद पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था। साहिर अपने सिने करियर में दो बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार के फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किये गये। लगभग तीन दशक तक हिन्दी सिनेमा को अपने रूमानी गीतों से सराबोर करने वाले साहिर लुधियानवी 59 वर्ष की उम्र में 25 अक्टूबर 1980 को इस दुनिया को अलविदा कह गये।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित