, Jan. 14 -- वर्ष 1942 मे कैफी आजमी उर्दू और फारसी की उच्च शिक्षा के लिये लखनऊ और इलाहाबाद भेजे गये लेकिन उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ग्रहण करके पार्टी कार्यकर्ता के रूप मे कार्य करना शुरू कर दिया और फिर भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हो गये।इस बीच मुशायरोंं में कैफी आजमी की शिरकत जारी रही। इसी दौरान वर्ष 1947 में एक मुशायरे मे भाग लेने के लिये वह हैदराबाद पहुंचे] जहां उनकी मुलाकात शौकत आजमी से हुयी और उनकी यह मुलाकात जल्दी ही शादी मे तब्दील हो गयी। आजादी के बाद कैफी के पिता और भाई पाकिस्तान चले गये लेकिन उन्होंने हिंदुस्तान में ही रहने का निर्णय लिया।
शादी के बाद बढ़ते खर्चों को देखकर कैफी आजमी ने एक उर्दू अखबार के लिये लिखना शुरू कर दिया, जहां से उन्हें 150 रुपये मासिक वेतन मिलता था। उनकी पहली नज्म ..सरफराज.. लखनऊ में छपी। शादी के बाद उनके घर का खर्च बहुत मुश्किल से चल पाता था। उन्होंने एक अन्य रोजाना अखबार में हास्य व्यंग्य भी लिखना शुरू किया लेकिन तब भी खर्चे पूरे नहीं हुए तो उन्होंने फिल्मी गीत लिखने का निश्चय किया।
कैफी ने सबसे पहले शाहिद लतीफ की फिल्म ..बुजदिल.. के लिये दो गीत लिखे जिसके एवज मे उन्हें 1000 रुपये मिले। इसके बाद वर्ष 1959 में प्रदर्शित फिल्म फिल्म कागज के फूल के लिये कैफी आजमी ने ..वक्त ने किया क्या हसीं सितम तुम रहे ना तुम हम रहे ना हम .जैसा सदाबहार गीत लिखा। वर्ष 1965 में प्रदर्शित फिल्म ..हकीकत .. में उनके रचित गीत .$कर चले हम फिदा जानों तन साथियो अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों .$की कामयाबी के बाद कैफी सफलता के शिखर पर जा पहुंचे।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी कैफी आजमी ने फिल्म गर्म हवा की कहानी संवाद और पटकथा भी लिखी जिनके लिये उन्हें फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। फिल्म हीर- रांझा के संवाद के साथ-साथ कैफी आजमी ने श्याम बेनेगल की फिल्म ..मंथन .की पटकथा भी लिखी। लगभग 75 वर्ष की आयु के बाद कैफी आजमी ने अपने गांव मिजवां में ही रहने का निर्णय किया। अपने रचित गीतों से श्रोताओं को भावविभोर करने वाले महान शायर और गीतकार कैफी आजमी 10 मई 2002 को इस दुनिया से रुखसत हो गये।
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