मुंबई , मई 21 -- महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के प्रमुख राज ठाकरे और बाकी सभी सह-आरोपियों को 2008 के रेलवे भर्ती विरोध मामले में अदालत ने बरी कर दिया है।
सत्र न्यायाधीश अभिजीत ए कुलकर्णी ने कहा कि अभियोजन अपराध साबित करने के लिए काफी सबूत पेश करने में नाकाम रहा, यानी बाहरी छात्रों पर हमला या आरोपियों की संलिप्तता को साफ तौर पर साबित करने में नाकाम रहा। अदालत ने सबूतों की कमी के कारण श्री ठाकरे को बरी कर दिया और उन्हें भड़काऊ बयान देने के आरोपों से भी राहत दी।
आरोपियों का मुकदमा लड़ने वाले वकील शैलेश सादेकर ने संवाददाताओं को बताया कि खुली अदालत में बरी करने का फैसला सुनाया गया। उन्होंने कहा कि विस्तृत आदेश का आना अभी बाकी है। बचाव पक्ष के वकील के मुताबिक अभियोजन कोई पक्का सबूत नहीं दे पाया कि श्री ठाकरे ने कोई भड़काऊ या भड़काऊ भाषण दिया था।
अदालत ने इसके अलावा राज्य की तरफ से जमा किए गए इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि सबूत के तौर पर पेश की गई वीडियो सीडी का कानून की नजर में 'कोई मतलब नहीं' है। अभियोजन यह भी साबित नहीं कर पाया कि आंदोलन के दौरान बाहरी छात्रों पर हमला करने वाले लोग मनसे के असली कार्यकर्ता थे।
अदालत ने आरोपियों को संदेह का फायदा देते हुए इसमें शामिल सभी लोगों को बरी करने का आदेश दिया। श्री ठाकरे 13 मई को पिछली सुनवाई के दौरान अपना बयान दर्ज कराने के लिए अदालत में खुद पेश हुए थे और उन्होंने अपने खिलाफ लगे सभी आरोपों से इनकार किया था। उन्होंने अदालत के सामने कहा था, 'इस जुर्म से मेरा कोई लेना-देना नहीं है।' बुधवार को जब आखिरी फैसला सुनाया गया तो श्री ठाकरे अदालत कक्ष में मौजूद थे। उनके साथ मनसे नेता अविनाश जाधव और पार्टी समर्थकों की एक बड़ी भीड़ थी, जिन्होंने अदालत परिसर के बाहर फैसले का जश्न मनाया।
गौरतलब है कि यह मामला अक्टूबर 2008 का है, जब देशभर में रेलवे भर्ती परीक्षाएं आयोजित की गई थीं। मुंबई और कल्याण केंद्रों पर तब बड़ा विवाद खड़ा हो गया था जब मनसे कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि उत्तर भारतीय उम्मीदवारों को बहुत अधिक तरजीह दी जा रही है, जबकि स्थानीय मराठी युवाओं को प्रवेश टिकट और परीक्षा हॉल में प्रवेश नहीं दी जा रही है।
मनसे कार्यकर्ताओं ने परीक्षा केंद्रों में जबरदस्ती घुसकर उत्तर प्रदेश और बिहार के उम्मीदवारों के साथ मारपीट की, परीक्षा के पेपर्स फाड़ दिए और रेलवे संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया। हिंसक विरोध तेजी से पूरे महाराष्ट्र में फैल गए, जिससे सरकारी बसों में बड़े पैमाने पर तोड़-फोड़ हुई और बाहरी लोगों को निशाना बनाकर झड़पें हुईं।
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