भिवानी , जुलाई 04 -- कांग्रेस नेत्री एवं महिला विंग की पूर्व प्रदेश महासचिव सविता मान ने कहा कि यूपीए सरकार में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में 2004 से 2014 तक देश में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार थी। इस दौरान दुनिया ने कच्चे तेल का सबसे महंगा दौर देखा लेकिन पेट्रोल व डीजल आज के दौर से बहुत सस्ता था।
सुश्री मान ने निरंतर बढ़ हरे पेट्रोल, डीजल व एलपीजी गैस पर चिंता व्यक्त करते हुए कही। उन्होंने बताया कि 2008 में जब मनमोहन सिंह हमारे देश के प्रधानमंत्री थे तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 140 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई थी। इस दौरान कच्चे तेल का औसत मूल्य भी कुछ वर्ष लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहा। पूरे यूपीए कार्यकाल का औसत लगभग 80 डॉलर प्रति बैरल रहा। जबकि 2014 में मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार सत्ता में आई। उसके शुरुआती वर्षों में वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में भारी गिरावट आई। 2015-16 में कच्चे तेल का मूल्य लगभग 46 डॉलर प्रति बैरल और 2020-21 में लगभग 45 डॉलर प्रति बैरल रहा. 2014 से 2025 तक का औसत यूपीए की तुलना में उल्लेखनीय रूप से काफी कम रहा।
उन्होंने कहा कि यदि कच्चा माल सस्ता हो जाए तो उपभोक्ता को भी उसका लाभ मिलना चाहिए लेकिन ऐसा हुआ नहीं। भारत में तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। दिल्ली में 2004 में पेट्रोल लगभग 34 रुपये और डीजल लगभग 22 रुपये प्रति लीटर था। 2014 तक पेट्रोल लगभग 72 रुपये और डीजल लगभग 56 रुपये प्रति लीटर पहुंचा। पूरे दस वर्षों में पेट्रोल का औसत मूल्य लगभग 50 से 55 रुपये तथा डीजल का लगभग 35 से 40 रुपये प्रति लीटर रहा। 2014 के बाद जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता हुआ, तब पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वैसी गिरावट नहीं आई जिसकी आम लोगों को उम्मीद थी। इसके विपरीत 2021-22 में देश के अनेक शहरों में पेट्रोल 100 रुपये प्रति लीटर से ऊपर पहुंच गया। 2014 से 2025 के बीच पेट्रोल का औसत खुदरा मूल्य लगभग 80 से 90 रुपये तथा डीजल का लगभग 70 से 80 रुपये प्रति लीटर रहा।
उन्होंने कहा कि 2015 और 2016 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत लगभग आधी रह गई थी। लेकिन बावजूद इसके भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वैसी गिरावट नहीं आई, जैसी परिस्थितियों को देखते हुए अपेक्षित थी। यानी महंगे कच्चे तेल के दौर में औसत खुदरा कीमत कम रहीं और अपेक्षाकृत सस्ते कच्चे तेल के दौर में औसत खुदरा कीमत अधिक रहीं। खुदरा बाजार में मूल्य कम करने की बजाय 2014 के बाद केंद्र सरकार पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़ती चली गई। कोविड महामारी के दौरान जब कच्चा तेल ऐतिहासिक रूप से 40 डॉलर प्रति बैरल के भी नीचे था, उसी समय उत्पाद शुल्क में उल्लेखनीय वृद्धि की गई। इससे यह लग रहा है कि सरकार का जनहित से कोई सरोकार नहीं है। वह लोकतंत्र को खत्म करके तानाशाही रवैया अपनाते हुए केवल और केवल अपने लोगों को लाभ पहुंचाना चाहती है।
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