चेन्नई , अक्टूबर 26 -- मद्रास उच्च न्यायालय ने सोमवार को टीवीके के पदाधिकारियों आधव अर्जुन और सीटीआर द्वारा दायर अंदरूनी अदालत अपील की सुनवाई 10 नवंबर तक के लिए टाल दी है।
न्यायमूर्ति एन. सतीश कुमार और जी.के. मुथुकुमार की पीठ ने याचिका पर सुनवाई 10 नवंबर तक के लिए स्थगित कर दी।
निर्मल कुमार ने एकल न्यायाधीश के उस आदेश को चुनौती दी है जिसमें मुख्य विपक्षी दल द्रमुक को उनके एवं सत्ताधारी 'तमिलगा वेत्री कझगम' (टीवीके) की आईटी विंग के खिलाफ 1.01 करोड़ रुपये का मानहानि का मुकदमा दायर करने की अनुमति दी गयी है। यह मामला द्रमुक को ग्रेनाइट कारोबारी आर. वीरमणि (जेम ग्रेनाइट्स) से जुड़े पोक्सो मामले से जोड़ने वाली टिप्पणियों से संबंधित है।
इससे पहले पांच अक्टूबर को न्यायमूर्ति गोविंदराजन थिलाकावती ने द्रमुक महासचिव और पूर्व मंत्री दुरईमुरुगन की याचिका को स्वीकार कर लिया था। इस याचिका में उन्होंने मंत्रियों और टीवीके आईटी विंग के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए न्यायालय से अनुमति मांगी थी। न्यायालय ने मामले की स्वीकार्यता को लेकर प्रतिवादियों की आपत्तियों को खारिज कर दिया था।
याचिका में द्रमुक ने टीवीके के मंत्रियों और उनके आईटी विंग पर सोशल मीडिया के माध्यम एक झूठा और मानहानि करने वाला अभियान चलाने का आरोप लगाया। टीवीते नेताओं ने आरोप लगाया कि द्रमुक सरकार ने ग्रेनाइट कारोबारी को बचाया और मामले को दबाने की कोशिश की।
मंत्रियों की ओर से पेश हुए महाधिवक्ता विजय नारायण ने दलील दी कि उनके खिलाफ कार्यवाही शुरू करने से पहले उन्हें पूर्व नोटिस दी जानी चाहिए थी। चूंकि ऐसा कोई नोटिस नहीं दिया गया था इसलिए याचिका सुनवाई योग्य नहीं थी। वहीं, याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील जे. रवींद्रन ने कहा कि निर्मल कुमार और आधव अर्जुन को इस मामले में उनकी व्यक्तिगत हैसियत से शामिल किया गया है, न कि मंत्रियों की हैसियत से।
याचिका में एक्स, मेटा प्लेटफॉर्मों और यूट्यूब के खिलाफ मुकदमा दायर करने का निर्देश देने की भी मांग की गयी थी क्योंकि इन प्लेटफॉर्मों से झूठी और मानहानि करने वाली पोस्ट हटाने की अपील की गयी थी। लेकिन ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां, साथ ही दो मंत्री और टीवीके आईटी विंग, उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पीठ ने द्रमुक को दो मंत्रियों और टीवीके आईटी विंग के खिलाफ मानहानि की कार्यवाही शुरू करने की अनुमति दे दी लेकिन आदेश सुरक्षित रखते हुए कोई तारीख तय नहीं की। इसे चुनौती देते हुए, दोनों मंत्रियों ने खंडपीठ के समक्ष एक अंदरूनी अदालत अपील दायर की।
पिछली सुनवाई के दौरान पीठ ने मंत्रियों और द्रमुक, दोनों को मौखिक रूप से निर्देश दिया कि वे इस मुद्दे का राजनीतिकरण न करें क्योंकि इससे जांच कमजोर हो सकती है और आरोपियों के लिए कानून की पकड़ से बच निकलने का रास्ता खुल सकता है। पीठ ने टिप्पणी की, "यह नाबालिग बच्चियों के जीवन का मामला है। यह मुद्दा बहुत संवेदनशील है और हम सभी की एक सामाजिक जिम्मेदारी है।"अपनी याचिका में द्रमुक ने कहा कि इस मामले में प्राथमिकी सात अक्टूबर 2025 को, यानी उनके शासनकाल के दौरान ही तुरंत दर्ज की गयी थी। यह प्राथमिकी एक बाल अधिकार कार्यकर्ता द्वारा पुलिस को एक वीडियो क्लिप सौंपे जाने के ठीक अगले दिन दर्ज की गयी थी; इस वीडियो में एक नाबालिग बच्ची के कथित यौन उत्पीड़न की घटना दिखायी गयी थी। इसके बाद, उपलब्ध सबूतों के आधार पर कानून के अनुसार जांच आगे बढ़ायी गयी।
श्री दुरैमुरुगन ने यह भी स्पष्ट किया कि उस समय सत्ता में रही द्रमुक ने जांच में किसी भी तरह का कोई हस्तक्षेप नहीं किया था।
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