चेन्नई , अक्टूबर 14 -- मद्रास उच्च न्यायालय ने बुधवार को जेम ग्रेनाइट्स के मालिक आर. वीरमणि के खिलाफ पोक्सो मामलों की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से कराने की मांग वाली याचिका वापस लिए जाने के बाद खारिज कर दिया।

वराही नाम के व्यक्ति की ओर से पहले दायर की गई एक याचिका पर न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायण ने सुनवाई की। उन्होंने 30 सितंबर को इसी तरह की एक मांग को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि तमिलनाडु सरकार द्वारा गठित एसआईटी को मामले से जुड़े सभी सबूत इकट्ठा करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए। न्यायाधीश ने यह भी कहा कि तमिलनाडु पुलिस के पास कोई जादुई गोला या छड़ी नहीं है जिससे वह एक ही बार में सारे सबूत जुटा सकें, और उन्होंने कहा कि एसआईटी को जांच जारी रखने की इजाज़त दी जानी चाहिए।

सात अक्टूबर को जब मामले की सुनवाई हुई, तो न्यायाधीश ने सीबीआई जांच की मांग को फिर से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि एसआईटी की जांच सही दिशा में आगे बढ़ रही है और पोक्सो अदालत की जज एस. पद्मा मामले को अच्छे से संभाल रही हैं। इसके बाद उन्होंने मामले की अगली सुनवाई 26 अक्टूबर के लिए निर्धारित कर दी।

इसी बीच, चेन्नई के वकील सी. राजशेखरन ने सीबीआई जांच की मांग करते हुए एक अलग याचिका दायर की। अपनी याचिका में उन्होंने कहा कि सीबीआई ने अक्टूबर 2025 में बाल कल्याण कार्यकर्ता द्वारा दी गई पेन ड्राइव के आधार पर यौन उत्पीड़न का मामला दर्ज किया था।

बाद में पुलिस ने पोक्सो अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की जिसमें कहा गया कि नाबालिग पीड़ितों का पता नहीं चल सका। हालांकि, विशेष अदालत ने रिपोर्ट स्वीकार करने से इनकार कर दिया और आगे जांच का आदेश दिया जिसके परिणामस्वरूप सात लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें विवादित व्यापारी वीरमणि, उसके दो परिचित शांति और उसके पति महेंद्र सिमकान, उसका पूर्व कर्मचारी गणेशन और नाबालिग लड़कियों को उसके पास लाने वाले उसके तीन चालक शामिल थे।

याचिकाकर्ता ने कहा कि पीड़ितों की पहचान कर ली गई है और उनके बयान दर्ज कर लिए गए हैं और जांच तेज़ी से आगे बढ़ रही है। हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया कि अटकलों पर आधारित मीडिया रिपोर्टें राजनीतिक दलों के नेताओं और अन्य लोगों को इस मामले से जोड़ रही हैं जिससे जांच में बाधा उत्पन्न हो सकती है और जनता के मन में संदेह पैदा हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया पर व्यापारी वीरमणि की सत्तापक्ष एवं विपक्षी पार्टियों के नेताओं के साथ तस्वीरें और वीडियो शेयर किए जा रहे हैं, जिससे यह धारणा बन रही है कि राजनीतिक नेताओं का आरोपी से संबंध है।

याचिकाकर्ता ने मामले के कथित राजनीतिकरण को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए सीबीआई को जांच सौंपने और मीडिया व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मामले से जुड़ी तस्वीरें और वीडियो प्रकाशित करने पर रोक लगाने की मांग की।

जब मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस.ए. धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुलमुर्गन की पीठ के सामने याचिका की सुनवाई हुई तो याचिकाकर्ता के वकील ने इसे वापस लेने की अनुमति मांगी। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने मामले की जांच के लिए पहले ही एक एसआईटी का गठन कर दिया है।

मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता से उन परिस्थितियों के बारे में पूछा जिनके कारण उन्हें याचिका दायर करनी पड़ी। जवाब में, उनके वकील ने कहा कि एसआईटी के गठन से पहले ही याचिका दायर की गई थी। इन दलीलों को स्वीकार करते हुए खंडपीठ ने याचिका को वापस लेने की अनुमति दी और उसे खारिज कर दिया।

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