लखनऊ , मई 9 -- मदरसों में आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा दिए जाने के बीच एक खास पहल के तहत इन संस्थानों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को भारत के कानून और संविधान की जानकारी देने के लिए एक किताब तैयार की गई है। जमीयत उलमा-ए-हिंद उत्तर प्रदेश के विधिक सलाहकार मौलाना काब रशीदी द्वारा लिखित यह किताब भारत के संविधान और विभिन्न कानूनों की मूलभूत जानकारी को खुद में समेटे है। लेखक का दावा है कि इस पुस्तक से मदरसा छात्रों को कानूनी तथा संवैधानिक अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों के बारे में भी जानकारी मिलेगी जिससे वह बेहतर नागरिक भी बनेंगे।

'भारतीय संविधान, एक वैचारिक अध्ययन' शीर्षक वाली इस किताब में कुल सात अध्याय हैं और इस किताब को मनोवैज्ञानिक तरीके से तैयार किया गया है ताकि मदरसों के बच्चे इसमें शामिल सामग्री को बेहतर ढंग से समझ सकें और उसे अपने जीवन में उतार सकें। इस किताब को मदरसों के 'सौम' दर्जे से पढ़ाया जाएगा जो आमतौर पर इंटरमीडिएट के समकक्ष माना जाता है। यह किताब पांच खंडों में होगी और इसका 10 भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी कराया जाएगा ताकि यह पूरे मुल्क में पहुंचे।

मौलाना ने कहा कि भारत की आजादी से लेकर सामाजिक क्षेत्र में भी मदरसों का बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। मदरसे स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र रहे हैं। हालांकि देश के मदरसों में लागू पाठ्यक्रमों में संविधान और कानून को एक विषय में के रूप में पढ़ाये जाने के उदाहरण लगभग ना के बराबर हैं। लिहाजा मौजूदा हालात में बहुत जरूरी है कि मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों को और अच्छा तथा ज्यादा जागरूक नागरिक बनाने के लिए उन्हें मुल्क के कानून और संविधान के बारे में भी पढ़ाया जाए। यह पुस्तक इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए ही तैयार की गई है।

मौलाना रशीदी ने बताया कि इस किताब को देश के सभी मदरसों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए, इसके लिए व्यापक अभियान चलाते हुए मुल्क के तमाम मदरसों तथा दीनी तालीम देने वाले अन्य इदारों से संपर्क किया जाएगा। इसके अलावा तमाम मस्जिदों में भी जाकर इस सिलसिले में जिम्मेदार लोगों को प्रेरित किया जाएगा। साथ ही इसके लिए देश की विभिन्न मदरसा शिक्षा परिषदों से भी संपर्क किया जाएगा कि वे अपनी निगरानी वाले मदरसों के पाठ्यक्रम में इस किताब को भी शामिल करें। यह किताब दरअसल मदरसों में सुधार (रिफॉर्म्स) की एक शुरुआत है।

मदरसों के संस्थापकों ने जिस मकसद से इन संस्थानों की नींव रखी थी, अगर सुधार के नाम पर उसी मकसद को नज़रअंदाज़ कर दिया गया, तो ऐसे सुधार आने वाली पीढ़ियों के लिए अच्छे संकेत नहीं होंगे। सही सुधार वही है, जो परंपरा और मूल उद्देश्यों को बचाते हुए समय के साथ आगे बढ़े।

मौलाना रशीदी ने कहा कि वर्तमान हालात में 'संविधान परक चेतना' अब सिर्फ एक एकेडमिक जरूरत ही नहीं, बल्कि मदरसों से जुड़े लोगों के लिए एक अनिवार्य कर्तव्य भी बन गई है। यही सोच इस पुस्तक की रचना की प्रेरक बनी।

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