नयी दिल्ली , सितंबर 17 -- उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को मणिपुर के मुख्य सचिव से राहत शिविरों में दर्ज की गयी 25 अप्राकृतिक मौतों की विस्तृत रिपोर्ट तलब की। इनमें एक मामला कथित रूप से यौन शोषण से भी जुड़ा है।

शीर्ष अदालत ने सवाल किया कि अप्राकृतिक मौतों में पोस्ट-मॉर्टम की संख्या इतनी कम क्यों है तथा मृतकों के परिजनों को सिर्फ 20-30 हज़ार रुपए का मुआवजा क्यों दिया गया।

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने राज्य को सभी मामलों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट तथा मौत के कारण का उल्लेख करने वाली अन्य सामग्री सहित विस्तृत जानकारी एकत्रित करने के निर्देश दिये। शीर्ष अदालत मणिपुर हिंसा से जुड़े यौन शोषण के मामलों की जांच से संबंधित याचिका की सुनवाई कर रही थी।

पीठ ने सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति गीता मित्तल (सेवानिवृत्त) के नेतृत्व वाली समिति की ओर से पेश की गयी रिपोर्ट को संज्ञान में लिया। रिपोर्ट में राहत शिविरों में हुई अप्राकृतिक मौतों तथा पीड़ित परिवारों को मिले मामूली मुआवज़े का उल्लेख किया गया। उच्चतम न्यायालय ने राज्य से सवाल किया कि 25 में से सिर्फ 20 मामलों में पोस्टमार्टम क्यों किया गया था। साथ ही मुआवज़े की रकम इतनी कम क्यों थी। समिति की रिपोर्ट में आठ जिलों में राहत शिविरों में हुई कुल 640 मौतों का भी उल्लेख किया गया।

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने चार जुलाई को समिति द्वारा तलब की गयी सूचना पर सवाल करते हुए मणिपुर के महाधिवक्ता से कहा, "अपने मुख्य सचिव से कह दीजिए कि आदेशों को दावत न दें। हमें बताइए कि आपने क्या कदम उठाए हैं।"पीठ ने राज्य को निर्देश दिया कि राहत शिविरों में रह रहे लोगों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए तथा जरूरी मेडिकल एवं बुनियादी सुविधाएं मुहैया करवाने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।

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