पटना, अप्रैल 03 -- बिहार में सहरसा जिले के ग्राम पंचायत सहसौल के 19 किसानों ने जल-जीवन-हरियाली अभियान के माध्यम से सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक जीवन में क्रांतिकारी बदलाव किया है।
किसान गणेश कुमार महतो ने बताया कि गांव के कई एकड़ जमीन में वर्ष भर जल भराव की समस्या बनी रहती थी। किसान खुद का जमीन होने के बाद भी धान,गेहूं आदि पारंपरिक खेती से महरूम थे। इसकी वजह से अधिकांश ग्रामीण या तो पलायन के लिए विवश थे या फिर दिहाड़ी के सहारे किसी तरह भरण-पोषण करने की मजबूरी थी।
ग्रामीण विकास विभाग की ओर से जल-जीवन-हरियाली अभियान के अस्तित्व में आने के बाद गांव के किसानों को कई महत्वपूर्ण योजनाओं की जानकारी मिली। उन्होंने मनरेगा मजदूरों के सहारे वर्षों से खराब पड़ी पानी से लबालब उपेक्षित जमीन को पोखर के रूप में तैयार किया और फिर इसमें मखाने की खेती शुरू की। आज गांव के 19 किसानों के लिए पोखर रूपी यह पोंड वार्षिक रूप से प्रति किसान के हिसाब से न्यूनतम 50 हजार रुपए की आमदनी का जरिया बन चुका है।
किसान महतो ने बताया कि मखाने की खेती में उन्हें अधिकतम 15 हजार रुपए तक खर्च करने पड़ते हैं। इसकी तुलना में खेती से वह तीन गुना से भी अधिक आमदनी कमा रहे हैं।
किसानों का मानना है कि बाजार में मखाने की कीमत 600-1200 रुपए प्रति किलो आसानी से मिल जाती है। इससे किसानों की जहां आर्थिक नींव मजबूत हुई है वहीं गांव में नए तालाब, पोखरों का सृजन भी हुआ है। यह पर्यावरण संतुलन के लिए काफी आवश्यक पहल है।
बिहार के ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार ने कहा कि राज्य में मखाना की खेती ग्रामीण आत्मनिर्भरता का प्रमुख जरिया है। इससे किसानों की आय में वृद्धि और रोजगार के अवसर तेजी से बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार मखाना विकास योजना के तहत उन्नत बीजों और टूल्स किट पर अनुदान दे रही है। इससे राज्य में तैयार मखाना वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रहा है।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित