भीलवाड़ा , मार्च 11 -- राजस्थान में वस्त्र नगरी भीलवाड़ा में बुधवार को शीतला सप्तमी के अवसर पर सदियों पुरानी 'मुर्दे की सवारी' (सनेती) निकालने की रस्म पूरी की गई।
इस बार की सवारी में श्रद्धा के साथ-साथ युवाओं का उत्साह और तकनीक के प्रति प्रेम भी झलका। दोपहर बाद चित्तौड़ वालों की हवेली के पास से जब यह शवयात्रा शुरू हुई, तो माहौल गमगीन होने के बजाय उल्लास से भरा था। सनेती पर लेटा युवक आकर्षण का केंद्र रहा। यात्रा में आतिशबाजी और ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच रंगों का जबरदस्त सैलाब उमड़ा। वाहनों में भरे गुलाल के कट्टों से पूरी सड़कों को सराबोर कर दिया गया। यात्रा के दौरान वाहन पर रखा 'इलाजी' का पुतला विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। परंपरा को जीवंत बनाने के लिए कुछ युवा आगे-आगे मिट्टी की हांडी लेकर विलाप करने का स्वांग रच रहे थे, जिन्हें बुजुर्ग हंसी-ठिठोली करते हुए ढांढ़स बंधा रहे थे। यह अद्भुत नजारा शहर के मुख्य मार्गों, रेलवे स्टेशन चौराहा, गोलप्याऊ और भीमगंज से होते हुए बड़े मंदिर तक पहुंचा।
पद्मश्री जानकीलाल भांड ने बताया कि यह परंपरा 426 वर्षों से अनवरत चली आ रही है। मंगलवार शाम को भैंरूजी के जागरण के बाद बुधवार को सर्राफा बाजार से यह सनेती निकाली गई। खास बात यह है कि इस आयोजन के दौरान जमकर हंसी-मजाक, फब्तियां और व्यंग्य का दौर चलता है, इसी कारण मर्यादा और लोक-मर्यादा के चलते महिलाओं का इस यात्रा में शामिल होना वर्जित माना जाता है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि इस रस्म को निभाने से समाज के आपसी मतभेद खत्म होते हैं और शहर में सुख-समृद्धि आती है।
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